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| संशय अज्ञान की उपज है, इसे ज्ञान की तलवार से काटकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ें। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4 (श्लोक 31-42)
श्लोक 31
संस्कृत: यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
भावार्थ: हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
विश्लेषण: 'यज्ञशिष्ट' का अर्थ है अपने कर्तव्यों को पूरा करने के बाद जो शेष बचे, उसे प्रसाद रूप में स्वीकार करना। जो व्यक्ति समाज या सेवा के लिए कुछ नहीं करता (अ-यज्ञ), वह न इस दुनिया में सुखी रह सकता है और न ही मृत्यु के बाद।
श्लोक 32
संस्कृत: एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥
भावार्थ: इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा।
विश्लेषण: यहाँ स्पष्ट किया गया है कि यज्ञ केवल कर्मकांड नहीं है; मन और इन्द्रियों का संयम भी यज्ञ है। ये सभी शरीर और मन की 'क्रियाओं' से उत्पन्न होते हैं। यह सत्य जानकर साधक कर्मों के बोझ से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 33
संस्कृत: श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
भावार्थ: हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।
विश्लेषण: धन-वस्तुओं के दान (द्रव्य यज्ञ) से कहीं अधिक श्रेष्ठ 'ज्ञान का यज्ञ' है। अंततः मनुष्य जितने भी कर्म करता है, उन सबका अंतिम लक्ष्य 'आत्मज्ञान' प्राप्त करना ही होता है।
श्लोक 34
संस्कृत: तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥
भावार्थ: उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे
विश्लेषण (ज्ञान प्राप्ति के तीन नियम): 1. प्रणिपात: अहंकार छोड़कर समर्पण करना। 2. परिप्रश्न: कपट छोड़कर सत्य जानने के लिए प्रश्न करना। 3. सेवा: गुरु के प्रति सेवा भाव रखना।
श्लोक 35
संस्कृत: यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
भावार्थ: जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा।
विश्लेषण: ज्ञान होने पर सारा 'भेद' मिट जाता है। तब मनुष्य को समझ आता है कि सभी प्राणी उसकी अपनी आत्मा के समान हैं और सभी भगवान में ही स्थित हैं।
श्लोक 36
संस्कृत: अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
भावार्थ: यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा।
विश्लेषण: ज्ञान की शक्ति असीम है। जैसे एक नाव बड़े सागर को पार करा देती है, वैसे ही आत्मज्ञान मनुष्य के समस्त पुराने पापों और दुखों के सागर को पार करने का सामर्थ्य देता है।
श्लोक 37
संस्कृत: यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
भावार्थ: क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है।
विश्लेषण: ज्ञान एक 'अग्नि' की तरह है। जैसे आग लकड़ी को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही आत्मज्ञान मनुष्य के कर्मों के संचित फलों (संस्कारों) को जला देता है जिससे नया जन्म और दुख नहीं होता।
श्लोक 38
संस्कृत: न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
भावार्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है।
विश्लेषण: ज्ञान परम शुद्ध है। जब मनुष्य निष्काम कर्मयोग से अपने मन को साफ कर लेता है, तो ज्ञान स्वतः ही उसके अंदर प्रकट हो जाता है।
श्लोक 39
संस्कृत: श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
भावार्थ: जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
विश्लेषण: ज्ञान प्राप्त करने के तीन अनिवार्य गुण—श्रद्धा, तत्परता (लगन) और इन्द्रिय नियंत्रण। इन तीनों के होने पर मनुष्य को तुरंत परम शांति मिल जाती है।
श्लोक 40
संस्कृत: अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
भावार्थ: विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
विश्लेषण: 'संदेह' (Doubt) को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। जो व्यक्ति हमेशा संशय में रहता है, वह कभी एकाग्र नहीं हो पाता और अंततः विनाश को प्राप्त होता है।
श्लोक 41
संस्कृत: योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम् । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
भावार्थ: हे धनंजय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किए हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।
विश्लेषण: जब कर्म 'योग' बन जाए और संशय 'ज्ञान' से मिट जाए, तब व्यक्ति संसार में काम करते हुए भी कर्मों के फल से पूरी तरह मुक्त रहता है।
श्लोक 42
संस्कृत: तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
भावार्थ: इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का विवेकज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
विश्लेषण (अध्याय का निष्कर्ष): श्रीकृष्ण अर्जुन को उठने का आदेश देते हैं। वे कहते हैं कि संदेह अज्ञान की संतान है, इसे ज्ञान की तलवार से काट डाल और अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार हो जा

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