श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 (1-10): कर्मयोग और संन्यास की एकता का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म और संन्यास की एकता के बारे में समझाते हुए, पृष्ठभूमि में कमल का फूल।
कर्मयोगी संसार में ऐसे रहता है जैसे जल में कमल का पत्ता

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 5 (श्लोक 1-10)

श्लोक 1

संस्कृत: सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥

भावार्थ: अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए।

विश्लेषण: अर्जुन यहाँ भ्रमित है। उसे लगता है कि 'कर्म संन्यास' (कर्मों को छोड़ना) और 'कर्मयोग' (कर्म करना) दो अलग विपरीत दिशाएँ हैं। वह श्रीकृष्ण से स्पष्ट उत्तर चाहता है कि उसके लिए बेहतर क्या है।


श्लोक 2

संस्कृत: सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है।

विश्लेषण: श्रीकृष्ण कहते हैं कि लक्ष्य दोनों का एक ही है—मोक्ष। लेकिन कर्मयोग (संसार में रहकर निःकाम भाव से सेवा करना) 'कर्म संन्यास' की तुलना में अधिक व्यावहारिक और सरल है।


श्लोक 3

संस्कृत: ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है।

विश्लेषण: संन्यास का अर्थ कपड़े बदलना नहीं, बल्कि 'मानसिक त्याग' है। जो व्यक्ति कर्म करते हुए भी न किसी से नफरत करता है और न कुछ पाने की लालसा रखता है, वह गृहस्थ होते हुए भी असली संन्यासी है।


श्लोक 4

संस्कृत: साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ॥

भावार्थ: उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: सांख्य (ज्ञान) और योग (कर्म) को अलग-अलग समझना अज्ञानता है। सच्चे विद्वान जानते हैं कि यदि आप किसी भी एक मार्ग पर पूरी निष्ठा से चलते हैं, तो आपको दोनों का फल (परमात्मा) मिलता है।


श्लोक 5

संस्कृत: यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥

भावार्थ: ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

विश्लेषण: मार्ग अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। जो व्यक्ति कर्म और ज्ञान के अंतिम परिणाम की एकता को समझ लेता है, वही सत्य को देख पाता है।


श्लोक 6

संस्कृत: सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥

भावार्थ: परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है

विश्लेषण: सीधे संन्यास लेना (काम छोड़ना) बहुत कठिन और दुखदायी हो सकता है यदि चित्त शुद्ध न हो। कर्मयोग चित्त को शुद्ध करता है, जिससे परमात्मा की प्राप्ति बहुत जल्दी और आसानी से हो जाती है।


श्लोक 7

संस्कृत: योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूत आत्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥

भावार्थ: जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

विश्लेषण: जब साधक को यह बोध हो जाता है कि 'जो आत्मा मेरे अंदर है, वही सबके अंदर है', तब वह संसार में सब कुछ करते हुए भी कर्मों के बंधन में नहीं फंसता।


श्लोक 8-9

संस्कृत: नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ । पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ॥

भावार्थ: तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूँघता, भोजन करता, गमन करता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्यागता, ग्रहण करता और आँखें खोलता-मूँदता हुआ भी यह माने कि "मैं कुछ भी नहीं करता हूँ"; सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं।

विश्लेषण: यह 'साक्षी भाव' की पराकाष्ठा है। ज्ञानी जानता है कि शरीर की सारी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों के कारण हो रही हैं। वह स्वयं को आत्मा के रूप में इन क्रियाओं से पूरी तरह अलग देखता है।


श्लोक 10

संस्कृत: ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

भावार्थ: जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।

विश्लेषण: जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता, वैसे ही जो व्यक्ति अपने कर्म भगवान को समर्पित कर देता है, वह संसार में रहकर भी उसके दोषों और पापों से अछूता रहता है।

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