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| इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 3 (श्लोक 31-43)
श्लोक 31
संस्कृत:
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
अनुवाद: जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।
विश्लेषण: श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति तर्क-वितर्क (दोष ढूँढना) छोड़कर केवल श्रद्धा के साथ 'निष्काम कर्म' के मार्ग पर चलता है, वह धीरे-धीरे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 32
संस्कृत:
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
अनुवाद: परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ।
विश्लेषण: जो लोग अहंकार के कारण सत्य को स्वीकार नहीं करते और केवल कमियाँ निकालते हैं, वे ज्ञान के अभाव में अपने जीवन का उद्देश्य खो देते हैं।
श्लोक 33
संस्कृत:
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
अनुवाद: सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा।
विश्लेषण: यहाँ 'स्वभाव' की ताकत बताई गई है। दमन (Suppression) काम नहीं आता क्योंकि हर कोई अपने मूल संस्कारों के वश में है। सुधार धीरे-धीरे 'स्वभाव' बदलने से होता है, हठ से नहीं।
श्लोक 34
संस्कृत:
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
अनुवाद: प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान् शत्रु हैं।
विश्लेषण: इन्द्रियों का स्वभाव है—पसंदीदा चीजों से 'राग' (लगाव) और नापसंद से 'द्वेष' करना। योगी वही है जो इन दोनों भावनाओं से ऊपर उठकर कार्य करे।
श्लोक 35
संस्कृत:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
अनुवाद: दूसरे के धर्म (कर्तव्य) से, गुण रहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है और दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
विश्लेषण: यह जीवन का बड़ा मंत्र है। किसी दूसरे की नकल करके सफल होने से बेहतर है कि आप अपनी प्रकृति (स्वधर्म) के अनुसार काम करें, भले ही उसमें संघर्ष हो। नकल करना व्यक्तित्व को मार देता है।
श्लोक 36
संस्कृत:
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
अनुवाद: अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ एक शाश्वत प्रश्न पूछते हैं—मनुष्य जानते हुए भी कि 'यह गलत है', पाप क्यों करता है? वह कौन सी शक्ति है जो उसे मजबूर करती है?
श्लोक 37
संस्कृत:
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥
अनुवाद: श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम (इच्छा) ही क्रोध है। यह कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू अपना शत्रु जान।
विश्लेषण: मुख्य विलेन 'काम' (Desire) है। जब इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह क्रोध बन जाती है। यह एक ऐसी आग है जिसे जितना भोगो, यह उतनी बढ़ती है।
श्लोक 38
संस्कृत:
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
अनुवाद: जिस प्रकार धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस 'काम' द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है।
विश्लेषण: काम के तीन स्तर बताए गए हैं: धुएँ जैसा (जल्द हटने वाला), मैल जैसा (साफ करने योग्य), और गर्भ के झिल्ली जैसा (कठिनता से हटने वाला)। यह हमारी बुद्धि पर पर्दा डाल देता है।
श्लोक 39
संस्कृत:
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
अनुवाद: हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है।
विश्लेषण: काम को 'अग्नि' कहा गया है। जैसे आग में घी डालने से वह और भड़कती है, वैसे ही इच्छाओं की पूर्ति उन्हें और बढ़ाती है, शांत नहीं करती।
श्लोक 40
संस्कृत:
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
अनुवाद: इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन्हीं के द्वारा ज्ञान को ढँककर जीवात्मा को मोहित करता है।
विश्लेषण: शत्रु (काम) कहाँ छिपा है? वह इन्द्रियों, मन और बुद्धि के अड्डों में बैठा है। यहीं से वह हमारे निर्णय गलत करवाता है।
श्लोक 41
संस्कृत:
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
अनुवाद: इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।
विश्लेषण: युद्ध की पहली रणनीति—शत्रु के अड्डों (इन्द्रियों) पर नियंत्रण करो। बिना इन्द्रिय निग्रह के ज्ञान टिक नहीं सकता।
श्लोक 42
संस्कृत:
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
अनुवाद: शरीर से श्रेष्ठ इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।
विश्लेषण (शक्ति का पदानुक्रम):
शरीर < इन्द्रियाँ < मन < बुद्धि < आत्मा
यदि आप आत्मा (सबसे शक्तिशाली) की शक्ति का अनुभव करें, तो नीचे की इन्द्रियों को वश में करना सरल हो जाता है।
श्लोक 43
संस्कृत:
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
अनुवाद: इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके, तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल।
विश्लेषण: अध्याय का सार—अपने आप को पहचानो (आत्मा को जानो) और उस सर्वोच्च शक्ति के जरिए अपनी बुद्धि और मन को आदेश दो। इसी प्रकार तुम इच्छाओं के जाल से निकलकर अपना कर्तव्य पूरा कर पाओगे।

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