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| मुझसे श्रेष्ठ और कुछ नहीं; पूरा जगत मुझमें वैसे ही पिरोया है जैसे धागे में मणियाँ। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 7 (श्लोक 1-10)
श्लोक 1
संस्कृत: मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे पार्थ! मुझमें अनन्य प्रेम से आसक्त मन वाले और मेरे ही आश्रित होकर योग में लगे हुए तुम जिस प्रकार मुझे (मेरे सम्पूर्ण ऐश्वर्य और स्वरूप को) संशयरहित जानोगे, उसे सुनो।
विश्लेषण: भगवान यहाँ 'पूर्ण ज्ञान' देने की भूमिका बना रहे हैं। वे कहते हैं कि केवल ध्यान ही नहीं, बल्कि मुझमें पूर्ण विश्वास और आसक्ति रखने से ही मुझे पूरी तरह समझा जा सकता है।
श्लोक 2
संस्कृत: ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥
भावार्थ: मैं तुम्हारे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को पूरी तरह कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य बाकी नहीं रह जाता।
विश्लेषण: 'ज्ञान' का अर्थ है ईश्वर के निराकार स्वरूप को जानना, और 'विज्ञान' का अर्थ है जगत में ईश्वर की अभिव्यक्ति को समझना। इसे जानने के बाद ज्ञान की खोज समाप्त हो जाती है।
श्लोक 3
संस्कृत: मनुष्य़ाणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥
भावार्थ: हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मुझे तत्व से (यथार्थ रूप से) जानता है।
विश्लेषण: यह श्लोक बताता है कि आत्मज्ञान का मार्ग कितना दुर्लभ है। अधिकांश लोग भौतिकता में उलझे हैं, और जो आध्यात्मिक हैं, उनमें भी बहुत कम लोग ईश्वर के असली तत्व तक पहुँच पाते हैं।
श्लोक 4
संस्कृत: भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी 'अपरा' (जड़) प्रकृति है।
विश्लेषण: भगवान अपनी भौतिक शक्ति (Material Energy) का परिचय दे रहे हैं। हमारा शरीर और यह दृश्य संसार इन्हीं आठ तत्वों से मिलकर बना है।
श्लोक 5
संस्कृत: अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
भावार्थ: यह तो मेरी अपरा (जड़) प्रकृति है, लेकिन हे महाबाहो! इससे दूसरी मेरी 'परा' (चेतन) प्रकृति को जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है।
विश्लेषण: जड़ प्रकृति के अलावा एक 'चेतन' शक्ति भी है—जीवात्मा। यही वह शक्ति है जो निर्जीव तत्वों में प्राण फूँकती है और इस संसार को चलाती है।
श्लोक 6
संस्कृत: एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
भावार्थ: तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों (जड़ और चेतन) से ही उत्पन्न होते हैं और मैं ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।
विश्लेषण: कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे ही 'सुपर क्रिएटर' हैं। पूरी सृष्टि उन्हीं से निकलती है और अंत में उन्हीं में समा जाती है।
श्लोक 7
संस्कृत: मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
भावार्थ: हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई भी कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं।
विश्लेषण (महान उपमा): जैसे माला के मनके तो दिखते हैं पर उन्हें जोड़ने वाला धागा नहीं दिखता, वैसे ही संसार की हर वस्तु में परमात्मा अदृश्य धागे की तरह मौजूद है।
श्लोक 8
संस्कृत: रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषत्व हूँ।
विश्लेषण: भगवान अपनी व्यापकता समझा रहे हैं। जल की प्यास बुझाने की शक्ति और सूरज की चमक—सब ईश्वर का ही एक रूप है।
श्लोक 9
संस्कृत: पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
भावार्थ: मैं पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन (प्राण) हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
विश्लेषण: हर वस्तु का जो 'मूल गुण' है, वही परमात्मा है। मिट्टी की खुशबू और अग्नि की गर्मी में भी ईश्वर ही प्रकट हो रहे हैं।
श्लोक 10
संस्कृत: बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
विश्लेषण: बीज के बिना वृक्ष संभव नहीं। इसी तरह ईश्वर समस्त सृष्टि के आदि बीज (Source) हैं। किसी की बुद्धिमानी भी उसी ईश्वरीय प्रकाश का हिस्सा है।

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