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| जैसे वायु आकाश में स्थित है, वैसे ही संपूर्ण जगत मुझमें स्थित है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 9 (श्लोक 1-10)
श्लोक 1
संस्कृत: इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! तुम दोष-दृष्टि से रहित हो (मुझमें दोष नहीं निकालते), इसलिए मैं तुम्हारे लिए इस परम गोपनीय 'विज्ञान सहित ज्ञान' को कहूँगा, जिसे जानकर तुम संसार के दुखों (अशुभ) से मुक्त हो जाओगे।
विश्लेषण: ज्ञान की प्राप्ति के लिए 'अनसूयवे' (ईर्ष्या या दोष-दृष्टि न होना) पहली शर्त है। जब शिष्य का मन निर्मल होता है, तभी गुरु उसे 'गुह्यतम' यानी सबसे गहरा रहस्य बताते हैं।
श्लोक 2
संस्कृत: राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
भावार्थ: यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा और सब रहस्यों का राजा है। यह अत्यंत पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्मयुक्त, करने में बहुत सुगम (आसान) और अविनाशी है।
विश्लेषण: इस ज्ञान को 'राजविद्या' कहा गया है क्योंकि यह सभी सांसारिक ज्ञानों से ऊपर है। खास बात यह है कि इसका फल 'प्रत्यक्ष' मिलता है और इसे करना बहुत 'सुखद' है, यह कोई कठिन तपस्या नहीं है।
श्लोक 3
संस्कृत: अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
भावार्थ: हे परंतप! इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार चक्र में भटकते रहते हैं।
विश्लेषण: श्रद्धा के बिना कोई भी ज्ञान फलित नहीं होता। जो संदेह करते हैं या ईश्वर की सत्ता पर विश्वास नहीं करते, वे बार-बार जन्म-मृत्यु के दुख भरे चक्र में फंसे रहते हैं।
श्लोक 4
संस्कृत: मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
भावार्थ: मुझ निराकार परमात्मा से यह सारा जगत (बर्फ के समान जल से) परिपूर्ण है। सभी भूत (प्राणी) मेरे अंतर्गत स्थित हैं, लेकिन मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
विश्लेषण: जैसे समुद्र में लहरें होती हैं—लहरें समुद्र के आधार पर हैं, पर समुद्र केवल लहर नहीं है। वैसे ही भगवान पूरी सृष्टि का आधार हैं, पर वे सृष्टि की सीमाओं में बंधे हुए नहीं हैं।
श्लोक 5
संस्कृत: न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
भावार्थ: वे सब भूत वास्तव में मुझमें स्थित नहीं हैं। मेरी इस ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का पालन और पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन भूतों में स्थित नहीं है।
विश्लेषण: यह एक गहरा विरोधाभास है जिसे 'योगमैश्वरम्' कहा गया है। भगवान सब कुछ रचते हैं और संभालते हैं, फिर भी वे सबसे अलिप्त (Detached) और स्वतंत्र रहते हैं।
श्लोक 6
संस्कृत: यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
भावार्थ: जैसे आकाश में हर जगह विचरने वाली महान वायु हमेशा आकाश में ही स्थित रहती है, वैसे ही सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं—ऐसा जानो।
विश्लेषण (महान उपमा): वायु आकाश में है, आकाश के बिना वायु का अस्तित्व नहीं, फिर भी आकाश वायु से अछूता (Unffected) रहता है। ठीक इसी तरह पूरी सृष्टि परमात्मा में है, पर परमात्मा इससे निर्लेप रहते हैं।
श्लोक 7
संस्कृत: सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! कल्पों के अंत में सभी प्राणी मेरी 'प्रकृति' (मूल कारण) में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें फिर से रचता हूँ।
विश्लेषण: सृष्टि की प्रक्रिया एक चक्र (Cycle) है। प्रलय के समय सब कुछ भगवान की शक्ति में सिमट जाता है और सृष्टि के समय फिर से प्रकट होता है।
श्लोक 8
संस्कृत: प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
भावार्थ: अपनी प्रकृति को स्वीकार करके, मैं स्वभाव के वश में हुए इस संपूर्ण प्राणी समुदाय को उनके कर्मों के अनुसार बार-बार रचता हूँ।
विश्लेषण: जीव अपने पुराने कर्मों और स्वभाव (Nature) के कारण विवश हैं। भगवान इसी स्वभाव के अनुसार उन्हें बार-बार जन्म देते हैं।
श्लोक 9
संस्कृत: न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! उन सृष्टि-रचना के कर्मों में मैं आसक्ति रहित और उदासीन की तरह स्थित रहता हूँ, इसलिए वे कर्म मुझे नहीं बाँधते।
विश्लेषण: भगवान सृष्टि तो बनाते हैं पर उसमें उलझते नहीं। जैसे सूरज की रोशनी में अच्छे-बुरे सब काम होते हैं पर सूरज उन कामों के फल से नहीं बंधता, वैसे ही परमात्मा सृष्टि रचकर भी मुक्त रहते हैं।
श्लोक 10
संस्कृत: मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! मेरी अध्यक्षता (निगरानी) में मेरी प्रकृति इस चराचर जगत को रचती है और इसी कारण यह संसार चक्र घूम रहा है।
विश्लेषण: प्रकृति अपने आप कुछ नहीं करती, वह परमात्मा की 'अध्यक्षता' में काम करती है। ईश्वर वह 'पावर' है जिसके कारण प्रकृति में गति और जीवन आता है।

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