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| एक मार्ग मुक्ति देता है और दूसरा पुनर्जन्म; ज्ञानी सदैव प्रकाश के मार्ग को चुनता है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 8 (श्लोक 21-28)
श्लोक 21
संस्कृत: अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
भावार्थ: जो अव्यक्त 'अक्षर' नाम से कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं। जिस सनातन भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस (संसार में) नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।
विश्लेषण: भगवान अपने 'धाम' की परिभाषा दे रहे हैं। यह कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह सर्वोच्च अवस्था है जहाँ पहुँचने के बाद जीव दोबारा दुखों के इस संसार में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 22
संस्कृत: पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥
भावार्थ: हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सभी भूत हैं और जिससे यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह परम पुरुष केवल 'अनन्य भक्ति' (बिना किसी और के सहारे) से ही प्राप्त होने योग्य है।
विश्लेषण: ईश्वर को पाने का एकमात्र साधन प्रेम और अटूट भक्ति है। वे सर्वव्यापी हैं, जैसे सोने के गहनों में सोना व्याप्त होता है, वैसे ही पूरी सृष्टि में वे समाए हुए हैं।
श्लोक 23
संस्कृत: यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जिस मार्ग (काल) से शरीर त्यागकर गए हुए योगी वापस न लौटने वाली गति को और जिस मार्ग से गए हुए वापस लौटने वाली गति को प्राप्त होते हैं, उन दोनों मार्गों के विषय में मैं कहूँगा।
विश्लेषण: यहाँ 'काल' शब्द का अर्थ मार्ग या पथ से है। मृत्यु के बाद आत्मा किस रास्ते पर जाती है, वह उसके जीवन भर के कर्मों और अंतिम समय की चेतना पर निर्भर करता है।
श्लोक 24
संस्कृत: अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
भावार्थ: जिस मार्ग में ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने हैं, उस मार्ग में शरीर छोड़ने वाले ब्रह्मवेत्ता (ज्ञानी) योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
विश्लेषण (शुक्ल मार्ग/देवयान): यह प्रकाश का मार्ग है। जो योगी ज्ञान और निष्काम भाव में रहते हैं, वे इस मार्ग से जाकर मुक्त हो जाते हैं। उन्हें दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।
श्लोक 25
संस्कृत: धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
भावार्थ: जिस मार्ग में धुआं, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने हैं, उस मार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी चंद्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर (स्वर्ग में फल भोगकर) पुनः वापस आता है।
विश्लेषण (कृष्ण मार्ग/पितृयान): यह अंधकार या धुएं का मार्ग है। जो लोग पुण्य तो करते हैं पर उनके पीछे भोग की इच्छा (स्वर्ग जाने की चाह) होती है, वे कुछ समय सुख भोगकर वापस इसी मृत्युलोक में जन्म लेते हैं।
श्लोक 26
संस्कृत: शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥
भावार्थ: जगत के ये दो मार्ग—शुक्ल और कृष्ण—शाश्वत माने गए हैं। एक मार्ग से गया हुआ वापस नहीं लौटता (मोक्ष) और दूसरे से गया हुआ फिर वापस लौटता है (पुनर्जन्म)।
विश्लेषण: यह सृष्टि का पुरातन नियम है। प्रकाश का मार्ग मुक्ति की ओर ले जाता है और मोह या कामना का मार्ग जन्म-मरण के चक्र में घुमाता रहता है।
श्लोक 27
संस्कृत: नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
भावार्थ: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों के रहस्य को जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर योग (परमात्मा के चिंतन) से युक्त हो।
विश्लेषण: जब योगी को पता चल जाता है कि कौन सा रास्ता कहाँ ले जाता है, तो वह कभी गलत रास्ते का चुनाव नहीं करता। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को हर समय 'योगयुक्त' रहने की सलाह देते हैं।
श्लोक 28
संस्कृत: वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
भावार्थ: योगी पुरुष इस रहस्य को जानकर वेदों के अध्ययन, यज्ञ, तप और दान आदि से मिलने वाले समस्त पुण्यफलों को लाँघ जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है।
विश्लेषण (अध्याय का निष्कर्ष): केवल शास्त्र पढ़ना या दान करना पर्याप्त नहीं है। जो तत्व को जान लेता है और योग में स्थित हो जाता है, उसे उन सभी शुभ कर्मों से भी ऊंचा फल मिलता है—जो है स्वयं परमात्मा की प्राप्ति।

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