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| सब कुछ नष्ट होने पर भी जो शेष रहता है, वही अविनाशी परमात्मा है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 8 (श्लोक 11-20)
श्लोक 11
संस्कृत: यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
भावार्थ: वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा।
विश्लेषण: भगवान उस अंतिम लक्ष्य की बात कर रहे हैं जिसे 'अक्षर' कहा जाता है। इसे पाने के लिए संयम और वैराग्य की आवश्यकता होती है।
श्लोक 12
संस्कृत: सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
भावार्थ: सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर (वश में करके) तथा मन को हृदय में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्मा संबंधी योगधारणा में स्थित हो जाए।
विश्लेषण: यह ध्यान की उच्च तकनीक है। इंद्रियों को बाहर से हटाकर ऊर्जा को भीतर की ओर मोड़ना और उसे मस्तक (आज्ञा चक्र) पर केंद्रित करना ही योग का मार्ग है।
श्लोक 13
संस्कृत: ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
भावार्थ: जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है।
विश्लेषण: 'ॐ' परमात्मा का शब्द-प्रतीक है। अंत समय में इस दिव्य ध्वनि और भगवान के स्वरूप में डूबा हुआ व्यक्ति सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है।
श्लोक 14
संस्कृत: अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।
विश्लेषण: भगवान को पाने का सबसे सरल तरीका 'निरंतर स्मरण' है। जो भक्त अपने हर काम के बीच भगवान को याद रखता है, उसके लिए ईश्वर कहीं दूर नहीं हैं।
श्लोक 15
संस्कृत: मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
भावार्थ: परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।
विश्लेषण: इस संसार को 'दुःखालय' (दुखों का स्थान) कहा गया है। भगवान तक पहुँचने का अर्थ है—हमेशा के लिए जन्म-मृत्यु और दुखों के इस चक्र से बाहर निकल जाना।
श्लोक 16
संस्कृत: आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं।
विश्लेषण: यहाँ तक कि स्वर्ग और ब्रह्मलोक भी स्थायी नहीं हैं। वहाँ भी समय की सीमा है। केवल ईश्वर का धाम ही समय और काल से परे है।
श्लोक 17
संस्कृत: सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
भावार्थ: ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं।
विश्लेषण: यहाँ ब्रह्मांडीय समय का वर्णन है। ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी के अरबों वर्षों के बराबर होता है। इसे समझने वाला काल की नश्वरता को जान जाता है।
श्लोक 18
संस्कृत: अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥
भावार्थ: संपूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं।
विश्लेषण: जैसे हम जागने पर सक्रिय होते हैं और सोने पर शांत, वैसे ही ब्रह्मा के दिन में सृष्टि प्रकट होती है और रात में विलीन हो जाती है।
श्लोक 19
संस्कृत: भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
भावार्थ: हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है।
विश्लेषण: जीव अपनी इच्छाओं और कर्मों के कारण इस जन्म-मरण के चक्र में तब तक फँसा रहता है, जब तक वह आत्मज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता।
श्लोक 20
संस्कृत: परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
भावार्थ: उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
विश्लेषण: जब पूरी सृष्टि और ब्रह्मा भी लय हो जाते हैं, तब भी जो सत्य बचा रहता है, वही 'अक्षर ब्रह्म' है। यही वह स्थान है जहाँ पहुँचने के बाद कुछ भी नष्ट नहीं होता।

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