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| निरंतर स्मरण और कर्तव्य का पालन ही भगवद्प्राप्ति का मार्ग है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 8 (श्लोक 1-10)
श्लोक 1
संस्कृत: किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
भावार्थ: अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं?
विश्लेषण: सातवें अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण ने कुछ तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया था। अर्जुन यहाँ एक जिज्ञासु शिष्य की तरह उन सात पारिभाषिक शब्दों का अर्थ जानना चाहते हैं ताकि वे परम तत्व को समझ सकें।
श्लोक 2
संस्कृत: अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥
भावार्थ: हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं?
विश्लेषण: अर्जुन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न 'प्रयाणकाले' (मृत्यु के समय) के बारे में है। वे जानना चाहते हैं कि मृत्यु की पीड़ा और भ्रम के बीच कोई योगी भगवान को कैसे याद रख सकता है।
श्लोक 3
संस्कृत: अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
भावार्थ: श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है।
विश्लेषण: 'अक्षर' का अर्थ है जिसका कभी क्षरण न हो। 'अध्यात्म' वह चेतना है जो शरीर को चलाती है। और 'कर्म' वह सृजन शक्ति है जिसके कारण जीव उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 4
संस्कृत: अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥
भावार्थ: उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ।
विश्लेषण: यह भौतिक संसार (अधिभूत) नाशवान है। ब्रह्मांडीय शक्ति (अधिदैव) दिव्य है। लेकिन हमारे शरीर के भीतर होने वाले हर यज्ञ (क्रिया) के भोक्ता और साक्षी स्वयं परमात्मा (अधियज्ञ) हैं।
श्लोक 5
संस्कृत: अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
भावार्थ: जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
विश्लेषण: यह 'अंतिम विचार' का सिद्धांत है। जैसे कंप्यूटर बंद होते समय जो फाइल खुली होती है, वही अगली बार पहले आती है, वैसे ही मृत्यु के समय का विचार अगले जन्म या मोक्ष का निर्धारण करता है।
श्लोक 6
संस्कृत: यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
भावार्थ: हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।
विश्लेषण: हम चुनाव नहीं कर सकते कि मृत्यु के समय क्या याद आएगा। हमें वही याद आता है जिसका हम जीवन भर अभ्यास करते हैं। यदि जीवन भर मोह-माया में रहे, तो अंत में वही याद आएगा।
श्लोक 7
संस्कृत: तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
भावार्थ: इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।
विश्लेषण (जीवन का मंत्र): कृष्ण यह नहीं कह रहे कि माला लेकर बैठ जाओ। वे कहते हैं—'युद्ध भी कर' (अपने कर्तव्य निभा) और 'स्मरण भी कर'। कर्म के साथ परमात्मा का नाम जोड़ना ही वास्तविक योग है।
श्लोक 8
संस्कृत: अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
भावार्थ: हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।
विश्लेषण: मन को 'ट्रेन' करना पड़ता है। अभ्यास से चित्त की भटकन रुकती है और वह परमात्मा के 'दिव्य पुरुष' स्वरूप में एकाग्र होने लगता है।
श्लोक 9
संस्कृत: कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
भावार्थ: जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके पोषक, अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशवान और अविद्या (अंधकार) से परे परमेश्वर का स्मरण करता है।
विश्लेषण: यहाँ ईश्वर के आठ विशेषण दिए गए हैं। वे सूर्य की तरह ज्ञान के प्रकाशक हैं जो अज्ञान के अंधेरे को दूर करते हैं। वे इतने सूक्ष्म हैं कि आँखों से नहीं दिखते, पर इतने महान हैं कि पूरे ब्रह्मांड को पालते हैं।
श्लोक 10
संस्कृत: प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
भावार्थ: वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है।
विश्लेषण: यह प्राणों को ऊपर ले जाने की योग-क्रिया है। दोनों भौंहों के बीच (आज्ञा चक्र) में ध्यान केंद्रित कर शरीर छोड़ना महाप्रयाण कहलाता है, जो सीधे परमात्मा से मिला देता है।

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