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| जो मुझे सबमें देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 6 (श्लोक 21-30)
श्लोक 21
संस्कृत: सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
भावार्थ: इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं।
विश्लेषण: यह श्लोक 'अतीन्द्रिय सुख' की बात करता है। जो सुख चखने, देखने या सुनने से मिलता है, वह इंद्रियों का है और क्षणभंगुर है। लेकिन ध्यान से मिलने वाला सुख इन्द्रियों से परे है और स्थायी है।
श्लोक 22
संस्कृत: यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
भावार्थ: परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता।
विश्लेषण: जब साधक को ईश्वर का अनुभव होता है, तो उसे लगता है कि अब पाने को कुछ शेष नहीं बचा। यह लाभ इतना बड़ा है कि जीवन का सबसे बड़ा दुख (जैसे किसी प्रिय का वियोग या शारीरिक कष्ट) भी उसकी मानसिक शांति को हिला नहीं पाता।
श्लोक 23
संस्कृत: तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
भावार्थ: जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।
विश्लेषण: योग की परिभाषा यहाँ 'दुःख के वियोग' के रूप में दी गई है। इसे करने के लिए 'निर्विण्ण चेतसा' यानी बिना थके और बिना ऊबे, उत्साह के साथ निरंतर लगे रहना आवश्यक है।
श्लोक 24
संस्कृत: सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
भावार्थ: संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर (योग का अभ्यास करे)।
विश्लेषण: हमारी इच्छाएँ हमारे संकल्पों (Future Plans) से पैदा होती हैं। ध्यान के समय मन को शांत करने के लिए सभी भविष्य की योजनाओं और इंद्रियों की बाहरी दौड़ को पूरी तरह रोकना अनिवार्य है।
श्लोक 25
संस्कृत: शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
भावार्थ: क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे।
विश्लेषण: श्रीकृष्ण यहाँ 'शनैः शनैः' (धीरे-धीरे) पर जोर देते हैं। मन रातों-रात वश में नहीं आता। इसे धैर्य और बुद्धि के बल पर धीरे-धीरे परमात्मा की ओर मोड़ना चाहिए जब तक कि विचार पूरी तरह शांत न हो जाएं।
श्लोक 26
संस्कृत: यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
भावार्थ: यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे।
विश्लेषण: यह श्लोक ध्यान का सबसे व्यावहारिक सूत्र है। जब भी मन भागे, उसे डाँटें नहीं, बस जहाँ गया है वहाँ से उसे वापस ले आएं। यह बार-बार 'वापस लाने' का अभ्यास ही मन को वश में करता है।
श्लोक 27
संस्कृत: प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
भावार्थ: क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है।
विश्लेषण: जब मन की बेचैनी (रजोगुण) शांत हो जाती है और पाप/दोष मिट जाते हैं, तो योगी 'ब्रह्मभूत' (ईश्वरमय) हो जाता है। इसी अवस्था में सर्वोच्च आनंद (Bliss) की प्राप्ति होती है।
श्लोक 28
संस्कृत: युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
भावार्थ: वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है।
विश्लेषण: 'ब्रह्मसंस्पर्श' का अर्थ है परमात्मा की अनुभूति। जो योगी नियमित अभ्यास से अपने विकारों को धो डालता है, उसे ईश्वर के साथ एकाकार होने का वह सुख मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता।
श्लोक 29
संस्कृत: सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
भावार्थ: सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है।
विश्लेषण (समदर्शन): सच्चा योगी वह है जो खुद को सबके भीतर और सबको अपने भीतर देखता है। उसके लिए 'पराया' कोई नहीं रहता। उसे चींटी से लेकर हाथी तक, सबमें एक ही ईश्वरीय चेतना दिखती है।
श्लोक 30
संस्कृत: यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
भावार्थ: जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।
विश्लेषण: यह भगवान का महान आश्वासन है। जो व्यक्ति हर कण में ईश्वर को देखता है, भगवान उसके लिए सदैव प्रकट रहते हैं। भक्त और भगवान का यह संबंध कभी नहीं टूटता (अविनाशी होता है)।

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