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| "अपनी प्रकृति के विरुद्ध लड़ना असंभव है, ईश्वर के प्रति समर्पण ही समाधान है।" |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18 (श्लोक 51-60)
श्लोक 51
संस्कृत: बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
भावार्थ : विशुद्ध बुद्धि से युक्त, सात्त्विक धारण शक्ति के द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके तथा शब्दादि विषयों का त्याग करके राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करने वाला पुरुष (ब्रह्म प्राप्ति का पात्र है)।
विश्लेषण: यहाँ साधक की पहली योग्यता बताई गई है। बुद्धि का शुद्ध होना और इंद्रियों का विषयों (रूप, रस, शब्द आदि) से हटना अनिवार्य है ताकि मन स्थिर हो सके।
श्लोक 52
संस्कृत: विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
भावार्थ : एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, मन, वाणी और शरीर को वश में रखने वाला और निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला पुरुष (ब्रह्म प्राप्ति का पात्र है)।
विश्लेषण: साधना के लिए बाहरी वातावरण (एकांत) और शारीरिक अनुशासन (मितहार) बहुत जरूरी है। जब शरीर और वाणी वश में होते हैं, तभी ध्यान गहरा हो पाता है।
श्लोक 53
संस्कृत: अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
भावार्थ : अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है।
विश्लेषण: ये छह विकार (अहंकार आदि) ही मनुष्य को परमात्मा से दूर रखते हैं। इनका त्याग करने पर ही उस परम शांति का अनुभव होता है जो ब्रह्मभाव की स्थिति है।
श्लोक 54
संस्कृत: ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भावार्थ : फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है।
विश्लेषण: ब्रह्म साक्षात्कार का फल है 'परम प्रसन्नता'। ऐसा व्यक्ति अभाव में दुखी नहीं होता और न ही कुछ पाने की तड़प रखता है। वह सबको भगवान का रूप मानकर उनसे प्रेम (पराभक्ति) करता है।
श्लोक 55
संस्कृत: भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
भावार्थ : उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।
विश्लेषण: भक्ति ही वह माध्यम है जिससे ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का बोध होता है। "जानकर प्रविष्ट होना" का अर्थ है भक्त और भगवान की आत्मा का एक हो जाना।
श्लोक 56
संस्कृत: सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
भावार्थ : मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।
विश्लेषण: यहाँ भगवान उन लोगों को रास्ता दिखा रहे हैं जो गृहस्थ जीवन में हैं। यदि वे सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दें, तो उन्हें भी वही पद मिलेगा जो एक सन्यासी को मिलता है।
श्लोक 57
संस्कृत: चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
भावार्थ : सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो।
विश्लेषण: भगवान अर्जुन को 'सचेत' रहने का निर्देश दे रहे हैं। हर कार्य को करने से पहले और बाद में उसे ईश्वर को अर्पित करना ही बुद्धियोग का आधार है।
श्लोक 58
संस्कृत: मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
भावार्थ : मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा।
विश्लेषण: भगवान स्पष्ट चेतावनी दे रहे हैं—ईश्वर की शरण में आने पर बाधाएँ अपने आप दूर हो जाती हैं, लेकिन "मैं खुद कर लूँगा" यह अहंकार सर्वनाश का कारण बनता है।
श्लोक 59
संस्कृत: यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
भावार्थ : जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा।
विश्लेषण: भगवान मनोविज्ञान समझा रहे हैं। हम अपने 'स्वभाव' से बाहर नहीं जा सकते। अर्जुन क्षत्रिय हैं, उनका मन शांत बैठकर नहीं रह सकता; परिस्थिति उन्हें लड़ने पर मजबूर कर देगी।
श्लोक 60
संस्कृत: स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
भावार्थ : हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।
विश्लेषण: हमारे पिछले कर्म और संस्कार ही हमारा आज का स्वभाव बनाते हैं। हम अपनी प्रकृति के हाथों में यंत्र की तरह हैं, इसलिए बेहतर है कि हम मोह त्यागकर अपने कर्तव्य का पालन करें।

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