अध्याय 18 श्लोक 41 - 50 | मोक्षसंन्यासयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

समाज के विभिन्न कर्तव्यों को निष्ठा से निभाते हुए लोगों का चित्रण।
"अपने स्वाभाविक कर्म को पूर्ण कुशलता से करना ही परमात्मा की आराधना है।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18 (श्लोक 41-50)

श्लोक 41

संस्कृत: ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥

भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट करते हैं कि सामाजिक उत्तरदायित्व जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वाभाविक गुणों (सत्त्व, रज, तम) के आधार पर तय किए गए हैं।


श्लोक 42

संस्कृत: शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥

भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ॥42॥

विश्लेषण: बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वयं पर नियंत्रण और सत्य की खोज ब्राह्मण स्वभाव के मुख्य लक्षण हैं।


श्लोक 43

संस्कृत: शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥

भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥

विश्लेषण: रक्षा, शासन और नेतृत्व के लिए वीरता के साथ-साथ प्रशासनिक चतुरता और दृढ़ संकल्प आवश्यक है।


श्लोक 44

संस्कृत: कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥

भावार्थ : खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ॥44॥

विश्लेषण: वैश्य समाज की आर्थिक व्यवस्था (Economy) का आधार हैं, जबकि शूद्र अपने श्रम और सेवा से समाज के ढाँचे को मज़बूती प्रदान करते हैं।


श्लोक 45

संस्कृत: स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

भावार्थ : अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन ॥45॥

विश्लेषण: मोक्ष पाने के लिए कार्य को बदलना आवश्यक नहीं है, बल्कि कार्य के प्रति अपनी 'निष्ठा' को बढ़ाना पर्याप्त है।


श्लोक 46

संस्कृत: यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥

भावार्थ : जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है ॥46॥

विश्लेषण: यह 'कर्मयोग' का मूल मंत्र है। अपने पेशेवर कर्तव्यों को ही ईश्वर की पुष्प-पूजा मानकर अर्पित कर देना ही सच्ची साधना है।


श्लोक 47

संस्कृत: श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥

भावार्थ : अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ॥47॥

विश्लेषण: अपनी प्रकृति (Nature) के विरुद्ध किया गया श्रेष्ठ कार्य भी मानसिक तनाव देता है। अतः अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करना ही कल्याणकारी है।


श्लोक 48

संस्कृत: सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥

भावार्थ : अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं ॥48॥

विश्लेषण: संसार में कोई भी कर्म पूर्णतः दोषमुक्त नहीं होता। कर्ता को कर्म की छोटी-मोटी कमियों को छोड़कर उसके व्यापक उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए।


श्लोक 49

संस्कृत: असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥

भावार्थ : सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है ॥49॥

विश्लेषण: नैष्कर्म्यसिद्धि वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति कर्म तो करता है पर उसका मन कर्म के फल या अहंकार में नहीं फँसता, जिससे वह कर्म-बंधन से मुक्त रहता है।


श्लोक 50

संस्कृत: सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥

भावार्थ : जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ ॥50॥

विश्लेषण: कर्मों की कुशलता के बाद आने वाली यह मानसिक स्थिति मनुष्य को परब्रह्म के साथ एकाकार होने के योग्य बनाती है।

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