अध्याय 18 श्लोक 31 - 40 | मोक्षसंन्यासयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

एक चित्र जिसमें एक व्यक्ति कठिन साधना (सात्त्विक) कर रहा है और दूसरा क्षणिक भोगों (राजस) में डूबा है।
"जो सुख शुरू में कड़वा पर अंत में मीठा लगे, वही आत्मा को तृप्त करने वाला सात्त्विक सुख है।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 18 (श्लोक 31-40)

श्लोक 31

संस्कृत: यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥

भावार्थ: हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ (सही रूप में) नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

विश्लेषण: राजसी बुद्धि धुंधली होती है। व्यक्ति भ्रमित रहता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं, क्योंकि उसका निर्णय अक्सर उसके स्वार्थ और अहंकार से प्रभावित होता है।


श्लोक 32

संस्कृत: अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥

भावार्थ: हे अर्जुन! जो तमोगुण से ढकी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत (उल्टा) मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।

विश्लेषण: तामसी बुद्धि सबसे खतरनाक है। यह व्यक्ति को गलत काम करने पर भी यह यकीन दिलाती है कि वह सही कर रहा है। इसमें विवेक पूरी तरह मर जाता है।


श्लोक 33

संस्कृत: धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

भावार्थ: हे पार्थ! जिस अटूट धारण शक्ति (धृति) से मनुष्य ध्यान-योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखता है, वह धृति सात्त्विकी है।

विश्लेषण: सात्त्विक धैर्य वह है जो हमें कठिन समय में भी भटकने नहीं देता और हमारी ऊर्जा को ईश्वर की ओर लगाए रखता है।


श्लोक 34

संस्कृत: यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥

भावार्थ: परंतु हे अर्जुन! फल की इच्छा रखने वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और काम (भोग) को धारण करता है, वह धृति राजसी है।

विश्लेषण: राजसी धृति स्वार्थ पर टिकी होती है। व्यक्ति धैर्य तभी तक रखता है जब तक उसे धन, सुख या मान-सम्मान मिलने की उम्मीद होती है।


श्लोक 35

संस्कृत: यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥

भावार्थ: हे पार्थ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता, दुख और उन्मत्तता को नहीं छोड़ता (उसी में पड़ा रहता है), वह धृति तामसी है।

विश्लेषण: तामसी धैर्य वास्तव में 'कुतर्क' और 'आलस्य' है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुरी आदतों और नकारात्मक विचारों को छोड़ना ही नहीं चाहता।


श्लोक 36-37

संस्कृत: सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥

भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को सुन। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से आनंद पाता है और दुखों के अंत को प्राप्त होता है—जो आरंभ में विष जैसा लेकिन परिणाम में अमृत जैसा है, वह सुख सात्त्विक है।

विश्लेषण: सात्त्विक सुख (जैसे पढ़ाई, कसरत या ध्यान) शुरू में कठिन लगता है, लेकिन इसका अंत बहुत सुखद और शांतिदायक होता है।


श्लोक 38

संस्कृत: विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥

भावार्थ: जो सुख इंद्रियों और विषयों के संयोग से मिलता है, वह भोगते समय अमृत जैसा लगता है लेकिन परिणाम में विष के समान है, वह सुख राजस कहा गया है।

विश्लेषण: राजसी सुख (जैसे जंक फूड, नशा या क्षणिक वासना) तुरंत मजा देते हैं, लेकिन बाद में बीमारी, पछतावा और दुख लेकर आते हैं।


श्लोक 39

संस्कृत: यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ: जो सुख भोगते समय और परिणाम में भी आत्मा को मोहित (अंधा) करने वाला है तथा जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद (लापरवाही) से पैदा होता है, वह तामस सुख है।

विश्लेषण: केवल सोते रहना या काम से जी चुराना तामसी सुख है। इसमें न उन्नति है, न ही शांति, केवल अंधकार है।


श्लोक 40

संस्कृत: न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥

भावार्थ: पृथ्वी पर, आकाश में या देवताओं के बीच—ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से मुक्त हो।

विश्लेषण: भगवान यहाँ स्पष्ट कर देते हैं कि सृष्टि का हर कोना इन तीन गुणों के खेल से बंधा हुआ है। मुक्ति का अर्थ इन गुणों से ऊपर उठना है।

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