अध्याय 16 श्लोक 11 - 20 | दैवासुरसम्पद्विभागयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

एक अहंकारी व्यक्ति जो धन और शक्ति के नशे में चूर है और उसके पीछे नरक या पतन की छाया दिख रही है।
"अहंकार और वासना वे बेड़ियाँ हैं जो आत्मा को सबसे गहरे अंधकार में बाँध देती हैं।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 16 (श्लोक 11-20)

श्लोक 11

संस्कृत: चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

भावार्थ: वे मृत्युपर्यंत रहने वाली अनगिनत चिंताओं के घेरे में रहते हैं। विषय-भोगों को भोगना ही उनका परम लक्ष्य होता है और वे मानते हैं कि बस इतना ही सुख है (इसके आगे कुछ नहीं)।

विश्लेषण: आसुरी प्रवृत्ति का व्यक्ति वर्तमान के शारीरिक सुखों को ही सब कुछ मान लेता है। चूँकि उनकी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होतीं, इसलिए वे जीवन भर तनाव और चिंताओं में जलते रहते हैं।


श्लोक 12

संस्कृत: आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥

भावार्थ: वे आशा की सैकड़ों फाँसियों (बंधनों) से बँधे हुए, काम और क्रोध के वश में होकर, अपनी भोग-लिप्सा के लिए अन्यायपूर्वक धन बटोरने की कोशिश करते हैं।

विश्लेषण: जब सुख की इच्छा 'हवस' बन जाती है, तो मनुष्य सही और गलत का भेद भूल जाता है। वह धन कमाने के लिए किसी भी हद तक गिरने या किसी का भी अहित करने को तैयार रहता है।


श्लोक 13

संस्कृत: इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌॥

भावार्थ: वे सोचते हैं—"आज मैंने यह पा लिया है, अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। मेरे पास इतना धन है और भविष्य में इतना और हो जाएगा।"

विश्लेषण: यह श्लोक आज के 'अति-महत्वाकांक्षी' और केवल भौतिकवादी दृष्टिकोण का सटीक वर्णन है। ऐसा व्यक्ति कभी वर्तमान में संतुष्ट नहीं होता, वह केवल गणनाओं में जीता है।


श्लोक 14

संस्कृत: असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

भावार्थ: "उस शत्रु को मैंने मार दिया और दूसरों को भी मार डालूँगा। मैं ही ईश्वर (स्वामी) हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ।"

विश्लेषण: आसुरी बुद्धि का व्यक्ति खुद को ही ब्रह्मांड का केंद्र समझने लगता है। उसका अहंकार उसे अंधा कर देता है कि वह अमर और सर्वशक्तिमान है।


श्लोक 15-16

संस्कृत: आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥

भावार्थ: "मैं बड़ा धनी हूँ, ऊँचे खानदान वाला हूँ। मेरे जैसा दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और मौज मनाऊँगा।" इस प्रकार अज्ञान से मोहित और मोह के जाल में फँसे हुए वे लोग नरक में गिरते हैं।

विश्लेषण: यहाँ तक कि वे धर्म (यज्ञ-दान) भी केवल अपने अहंकार की तुष्टि के लिए करते हैं। उनका चित्त भ्रमित रहता है और अंततः वे अपने ही कर्मों के कारण पतन को प्राप्त होते हैं।


श्लोक 17

संस्कृत: आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌॥

भावार्थ: वे अपने-आप को श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष, धन और मान के नशे में चूर होकर, केवल नाम के लिए पाखंडपूर्वक बिना किसी शास्त्र विधि के यज्ञ करते हैं।

विश्लेषण: दिखावे की भक्ति और आडंबर आसुरी स्वभाव की पहचान है। उनका उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति नहीं, बल्कि समाज में अपनी धाक जमाना होता है।


श्लोक 18

संस्कृत: अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥

भावार्थ: अहंकार, बल, घमंड, वासना और क्रोध के आश्रित रहने वाले तथा दूसरों की निंदा करने वाले वे लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ (परमात्मा) से द्वेष करते हैं।

विश्लेषण: जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट देता है, वह वास्तव में उस ईश्वर को कष्ट दे रहा है जो हर जीव के हृदय में है। आसुरी व्यक्ति की घृणा अंततः परमात्मा के प्रति घृणा बन जाती है।


श्लोक 19

संस्कृत: तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

भावार्थ: उन द्वेष करने वाले, क्रूर और पापी नराधमों (मनुष्यों में नीच) को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों (हिंसक पशु आदि) में ही डालता हूँ।

विश्लेषण: प्रकृति का न्याय बहुत सटीक है। यदि कोई मनुष्य होकर भी राक्षसी कर्म करता है, तो उसे अगले जन्मों में वैसी ही योनियाँ मिलती हैं जहाँ वह अपनी क्रूरता का फल भोग सके।


श्लोक 20

संस्कृत: आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥

भावार्थ: हे अर्जुन! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनियों को प्राप्त होते हैं और मुझे न पाकर उससे भी अधिक नीच गति (घोर नरकों) को प्राप्त होते हैं।

विश्लेषण: यह चेतावनी है कि यदि मनुष्य ने अपनी प्रवृत्तियों को नहीं सुधारा, तो वह पतन की ऐसी गहराई में गिर जाएगा जहाँ से निकलना अत्यंत कठिन होगा।


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