अध्याय 16 श्लोक 1 - 10 | दैवासुरसम्पद्विभागयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

एक तरफ सौम्य और प्रकाशमान चेहरा (दैवीय) और दूसरी तरफ क्रोधित और अंधकारमय चेहरा (आसुरी) जो मानवीय स्वभाव के दो पहलुओं को दर्शाता है।
"दैवीय गुण हमें मुक्ति की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी प्रवृत्तियाँ विनाश की ओर।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 16 (श्लोक 1-10)

श्लोक 1

संस्कृत: अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान के लिए योग में दृढ़ स्थिति, सात्त्विक दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, शास्त्रों का अध्ययन, तप और मन-वाणी की सरलता—

विश्लेषण: (अगले दो श्लोकों के साथ) भगवान दैवीय गुणों की सूची शुरू करते हैं। 'अभय' यानी डर का न होना पहला गुण है, क्योंकि भयभीत व्यक्ति सत्य के मार्ग पर नहीं चल सकता।


श्लोक 2

संस्कृत: अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥

भावार्थ: अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, कर्तापन के अभिमान का त्याग, चित्त की शांति, किसी की चुगली न करना, प्राणियों पर दया, विषयों में आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक-मर्यादा का पालन (लज्जा) और व्यर्थ की चेष्टाओं का अभाव—

विश्लेषण: ये गुण व्यक्ति को मानसिक रूप से स्थिर और सामाजिक रूप से कल्याणकारी बनाते हैं। दूसरों के दोष न देखना (अपैशुनम्) एक उच्च दैवीय गुण है।


श्लोक 3

संस्कृत: तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि भारत॥

भावार्थ: तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर-भीतर की शुद्धि, किसी से शत्रुता न रखना और स्वयं में पूज्यता के अभिमान का न होना—हे भारत! ये सब दैवीय संपदा लेकर उत्पन्न पुरुष के लक्षण हैं।

विश्लेषण: यहाँ 'तेज' का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि वह प्रभाव है जिससे बुराई डरती है। भगवान अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि ये श्रेष्ठ गुण उसके भीतर मौजूद हैं।


श्लोक 4

संस्कृत: दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥

भावार्थ: हे पार्थ! पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये सब आसुरी संपदा को लेकर पैदा हुए पुरुष के लक्षण हैं।

विश्लेषण: 'आसुरी' स्वभाव का केंद्र 'मैं' (अहंकार) होता है। जहाँ दैवीय स्वभाव त्याग और सेवा पर टिका है, वहीं आसुरी स्वभाव दिखावे और क्रोध पर आधारित है।


श्लोक 5

संस्कृत: दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥

भावार्थ: दैवीय संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बंधन के लिए मानी गई है। हे अर्जुन! तू चिंता मत कर, क्योंकि तू दैवीय गुणों के साथ पैदा हुआ है।

विश्लेषण: हमारे गुण ही हमारा भविष्य तय करते हैं। अच्छे गुण हमें स्वतंत्र (मोक्ष) करते हैं, जबकि बुरे गुण हमें जन्म-मृत्यु के चक्र में और गहराई से फँसा देते हैं।


श्लोक 6

संस्कृत: द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥

भावार्थ: हे अर्जुन! इस संसार में मनुष्यों के दो ही प्रकार के समुदाय हैं—दैवीय और आसुरी। दैवीय स्वभाव का वर्णन तो विस्तार से हो गया, अब तू आसुरी स्वभाव के बारे में विस्तार से सुन।

विश्लेषण: भगवान अब मनोविज्ञान (Psychology) के उस पक्ष को छेड़ रहे हैं जिसे जानना जरूरी है ताकि हम स्वयं को और दूसरों को पहचान सकें।


श्लोक 7

संस्कृत: प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥

भावार्थ: आसुरी स्वभाव वाले लोग यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए (प्रवृत्ति) और क्या नहीं (निवृत्ति)। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार है और न ही सत्य है।

विश्लेषण: स्पष्ट विवेक का अभाव आसुरी स्वभाव की पहली पहचान है। उन्हें केवल तात्कालिक लाभ दिखता है, सही-गलत का आधार नहीं।


श्लोक 8

संस्कृत: असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥

भावार्थ: वे कहते हैं कि यह जगत आश्रयरहित, असत्य और बिना ईश्वर के है। यह केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से बना है और 'काम' (भोग) ही इसका एकमात्र कारण है। इसके अलावा और क्या है?

विश्लेषण: यह 'नास्तिकता' और 'भौतिकवाद' (Materialism) की पराकाष्ठा है। जब इंसान ईश्वर को नहीं मानता, तो वह नैतिक जिम्मेदारियों से भी मुक्त होने की कोशिश करता है।


श्लोक 9

संस्कृत: एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥

भावार्थ: इसी झूठी दृष्टि को अपनाकर, जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है और जिनकी बुद्धि मंद है, वे क्रूरकर्मा लोग जगत के नाश के लिए ही शक्तिशाली होते हैं।

विश्लेषण: जब विनाशकारी सोच और शक्ति का मेल होता है, तो वह समाज के लिए घातक बन जाती है। ऐसे लोग उन्नति नहीं, विनाश (अहित) लाते हैं।


श्लोक 10

संस्कृत: काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥

भावार्थ: वे कभी न पूरी होने वाली वासनाओं का सहारा लेकर, घमंड और मद में चूर होकर, मोहवश गलत सिद्धांतों को अपनाते हैं और अशुद्ध व्रतों (भ्रष्ट आचरण) को धारण करके संसार में विचरते हैं।

विश्लेषण: आसुरी व्यक्ति की इच्छाएँ एक ऐसी आग की तरह हैं जिसमें जितना तेल डालो, उतनी बढ़ती है। वे दिखावे के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

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