अध्याय 13 श्लोक 11 - 18 | क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

एक दीपक की लौ के भीतर ब्रह्मांड का प्रकाश और हृदय में विराजमान परमात्मा की एक सूक्ष्म छवि।
"वह परमात्मा प्रकाश का भी प्रकाश है और माया के अंधकार से सर्वथा परे है।"


श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 13 (श्लोक 11-18)

श्लोक 11

संस्कृत: अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

भावार्थ: अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थस्वरूप परमात्मा को ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है।

विश्लेषण: भगवान 'ज्ञान' की परिभाषा स्पष्ट करते हैं। जो बातें हमें आत्मा और परमात्मा के करीब ले जाएँ, वही ज्ञान हैं। इसके अलावा जो हमें अहंकार, मोह और संसार में उलझाए, वह सब 'अज्ञान' की श्रेणी में आता है।


श्लोक 12

संस्कृत: ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥

भावार्थ: जो जानने योग्य है (ज्ञेय), जिसे जानकर मनुष्य अमृत (परमानन्द) को प्राप्त होता है, उसे मैं कहूँगा। वह अनादि वाला परमब्रह्म न 'सत्' कहा जाता है, न 'असत्'।

विश्लेषण: भगवान अब उस 'परमात्मा' के बारे में बता रहे हैं जिसे जानना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। वह ब्रह्म इतना सूक्ष्म और महान है कि उसे हम केवल शब्दों (है या नहीं है) की सीमा में नहीं बाँध सकते।


श्लोक 13

संस्कृत: सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌ । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

भावार्थ: वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।

विश्लेषण: यह ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन है। इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मांड में जहाँ भी कोई हाथ काम कर रहा है या कोई आँख देख रही है, वह वास्तव में उसी एक परमात्मा की शक्ति से संचालित है।


श्लोक 14

संस्कृत: सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌ । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥

भावार्थ: वह संपूर्ण इंद्रियों के विषयों को जानने वाला है, पर वास्तव में इंद्रियों से रहित है। वह आसक्ति रहित होकर भी सबका पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।

विश्लेषण: परमात्मा के पास हमारे जैसे भौतिक अंग नहीं हैं, फिर भी वे सब कुछ सुनते और देखते हैं। वे संसार के स्वामी होकर भी उससे अछूते (Detached) हैं।


श्लोक 15

संस्कृत: बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌ ॥

भावार्थ: वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है। सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय (न जानने योग्य) है तथा वह अत्यंत पास भी है और बहुत दूर भी।

विश्लेषण: ईश्वर हमारे इतने पास है कि वह हमारी आत्मा ही है, लेकिन अज्ञानी के लिए वह इतना दूर है कि करोड़ों जन्मों तक नहीं मिलता। वह सूक्ष्म (Subtle) है, इसलिए साधारण आँखों से नहीं दिखता।


श्लोक 16

संस्कृत: अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥

भावार्थ: वह परमात्मा विभागरहित (एक) होने पर भी सब भूतों में अलग-अलग स्थित प्रतीत होता है। वह सबको पालने वाला, संहार करने वाला और सबको उत्पन्न करने वाला है।

विश्लेषण: जैसे एक ही आकाश अलग-अलग घड़ों के भीतर अलग दिखता है, वैसे ही एक ही ईश्वर हर जीव में अलग दिखता है। वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में सृष्टि का चक्र चलाता है।


श्लोक 17

संस्कृत: ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ ॥

भावार्थ: वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (प्रकाश का स्रोत) और अंधकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञानस्वरूप है, जानने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

विश्लेषण: सूर्य, चाँद और अग्नि को प्रकाश देने वाली महाज्योति परमात्मा ही है। वह बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने हृदय के भीतर बैठा 'साक्षी' है।


श्लोक 18

संस्कृत: इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥

भावार्थ: इस प्रकार क्षेत्र (शरीर), ज्ञान (साधन) और ज्ञेय (परमात्मा) का स्वरूप संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसे तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

विश्लेषण: भगवान ने इस अध्याय के तीन मुख्य विषयों को समेट दिया है। जो इन तीनों का अंतर समझ लेता है, वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर ईश्वर में लीन हो जाता है।

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