अध्याय 12 श्लोक 1- 10 | भक्तियोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में श्रद्धापूर्वक बैठा है और भगवान उसे प्रेम का मार्ग दिखा रहे हैं।
"जो मुझमें मन लगाते हैं, उनका संसार-सागर से उद्धार मैं स्वयं करता हूँ।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 12 (श्लोक 1-10)


श्लोक 1

संस्कृत: एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥

भावार्थ: अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्त निरंतर आपके सगुण रूप (साकार) की उपासना करते हैं, और जो अविनाशी निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं—इन दोनों प्रकार के उपासकों में श्रेष्ठ योगी कौन है?

विश्लेषण: अर्जुन यहाँ भक्ति मार्ग के सबसे बुनियादी सवाल को उठा रहे हैं: क्या ईश्वर को मूर्ति या रूप में पूजना बेहतर है, या उन्हें एक निराकार शक्ति के रूप में मानना?


श्लोक 2

संस्कृत: मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरे सगुण रूप को भजते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

विश्लेषण: भगवान साकार भक्ति को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसमें मन को टिकाना सरल होता है। अटूट श्रद्धा ही भक्त को ईश्वर से जोड़ती है।


श्लोक 3

संस्कृत: ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥

भावार्थ: परन्तु जो पुरुष इंद्रियों को वश में करके उस अक्षर (अविनाशी), अनिर्देश्य (अकथनीय), अव्यक्त (निराकार), सर्वव्यापी, अचिन्त्य, नित्य और अचल ब्रह्म की उपासना करते हैं—

विश्लेषण: (अगले श्लोक के साथ पूर्ण होता है) यहाँ निराकार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन है, जो मन और वाणी की पहुँच से परे है।


श्लोक 4

संस्कृत: सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

भावार्थ: वे अपनी इंद्रियों को पूरी तरह वश में करके, सभी परिस्थितियों में समान बुद्धि वाले और समस्त प्राणियों के हित में लगे हुए लोग भी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट करते हैं कि निराकार की राह कठिन भले हो, पर वह गलत नहीं है। इंद्रिय संयम और परोपकार इस मार्ग की अनिवार्य शर्तें हैं।


श्लोक 5

संस्कृत: क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥

भावार्थ: निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्त वाले पुरुषों के मार्ग में कष्ट अधिक है, क्योंकि जब तक मनुष्य में देह का अभिमान है, तब तक निराकार की गति (लक्ष्य) दुःखपूर्वक प्राप्त होती है।

विश्लेषण: जब तक हम स्वयं को 'शरीर' मानते हैं, तब तक बिना रूप वाले ईश्वर का ध्यान करना बहुत कठिन और थकाने वाला होता है। साकार भक्ति देहधारियों के लिए स्वाभाविक है।


श्लोक 6

संस्कृत: ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥

भावार्थ: परन्तु जो भक्त अपने संपूर्ण कर्मों को मुझे अर्पण करके, मेरे परायण होकर अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं—

विश्लेषण: (अगले श्लोक के साथ) ऐसे भक्त अपना पूरा बोझ परमात्मा पर डाल देते हैं और केवल प्रेम में मग्न रहते हैं।


श्लोक 7

संस्कृत: तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥

भावार्थ: हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमियों का मैं इस मृत्यु रूपी संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला (पार लगाने वाला) बन जाता हूँ।

विश्लेषण: भगवान स्वयं जिम्मेदारी लेते हैं। जो भक्त उन पर निर्भर है, उसे संसार के दुखों से निकालने के लिए भगवान स्वयं आगे आते हैं।


श्लोक 8

संस्कृत: मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥

भावार्थ: तू अपना मन मुझमें ही लगा और अपनी बुद्धि भी मुझमें ही स्थिर कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कोई संशय नहीं है।

विश्लेषण: यह भक्ति की उच्चतम अवस्था है जहाँ भक्त की सोच और समझ पूरी तरह ईश्वरमय हो जाती है। तब भक्त और भगवान अलग नहीं रह जाते।


श्लोक 9

संस्कृत: अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥

भावार्थ: यदि तू मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय! अभ्यास योग (निरंतर प्रयास) द्वारा मुझको प्राप्त करने की इच्छा कर।

विश्लेषण: भगवान रियायत देते हैं। अगर मन एक बार में नहीं लगता, तो बार-बार भगवान के नाम, रूप और गुणों का स्मरण (अभ्यास) करने से वह धीरे-धीरे स्थिर हो जाएगा।


श्लोक 10

संस्कृत: अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

भावार्थ: यदि तू इस अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिए (निष्काम भाव से) कर्मों को करता हुआ भी तू मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को पा लेगा।

विश्लेषण: यदि ध्यान और अभ्यास नहीं हो पा रहा, तो अपने कार्यों को ईश्वर की सेवा मानकर करें (जैसे दूसरों की मदद, मंदिर सेवा या धर्म के काम)। कार्य जब ईश्वर के लिए होता है, तो वह भी योग बन जाता है।

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