अध्याय 11 श्लोक 41- 50 | विश्वरूपदर्शनयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

भगवान श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट होकर भयभीत अर्जुन को सांत्वना दे रहे हैं।
"परमात्मा विराट भी हैं और भक्त के लिए अत्यंत सौम्य और करुणामय भी।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11 (श्लोक 41-50)

श्लोक 41

संस्कृत: सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥

भावार्थ: आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ (अधिकार के साथ) कहा है—

विश्लेषण: अर्जुन को अब अपनी पुरानी व्यवहार कुशलता पर ग्लानि हो रही है। उन्हें लग रहा है कि उन्होंने ब्रह्मांड के स्वामी को केवल एक साधारण मित्र समझकर नाम से पुकारा, जो उनकी अज्ञानता थी।


श्लोक 42

संस्कृत: यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ॥

भावार्थ: और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद (हँसी-मजाक) के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं—वह सब अपराध मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ।

विश्लेषण: अर्जुन उन क्षणों को याद कर रहे हैं जब वे कृष्ण के साथ साथ सोते थे या साथ भोजन करते थे। वे ईश्वर की 'अप्रमेय' (अचिन्त्य) शक्ति के सामने नतमस्तक होकर माफ़ी माँग रहे हैं।


श्लोक 43

संस्कृत: पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥

भावार्थ: आप इस चराचर जगत के पिता, सबसे बड़े गुरु और अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाव वाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर आपसे अधिक तो कोई कैसे हो सकता है?

विश्लेषण: यहाँ अर्जुन कृष्ण को जगत के 'आदि गुरु' के रूप में पहचानते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि पूरी सृष्टि में श्रीकृष्ण की सत्ता के बराबर कोई दूसरी शक्ति नहीं है।


श्लोक 44

संस्कृत: तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌। पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌॥

भावार्थ: इसलिए हे प्रभो! मैं शरीर को चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके आपसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूँ। हे देव! जैसे पिता पुत्र के, सखा सखा के और पति पत्नी के अपराध सहन करते हैं, वैसे ही आप भी मेरे अपराध सहन करें।

विश्लेषण: अर्जुन भगवान से 'न्याय' नहीं बल्कि 'संबंध' के आधार पर क्षमा माँग रहे हैं। वे ईश्वर के साथ अपने प्रेमपूर्ण रिश्तों का वास्ता दे रहे हैं।


श्लोक 45

संस्कृत: अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

भावार्थ: मैं पहले कभी न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित (खुश) हो रहा हूँ, पर मेरा मन भय से अत्यंत व्याकुल भी है। इसलिए आप मुझे अपना वह 'देवरूप' (चतुर्भुज रूप) दिखलाइए। हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

विश्लेषण: विराट रूप का विस्मय अब सहनशक्ति से बाहर हो रहा है। अर्जुन अब उस रूप को देखना चाहते हैं जिससे वे प्रेम कर सकें, न कि जिससे वे डरें।


श्लोक 46

संस्कृत: किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥

भावार्थ: मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप फिर से उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट होइए।

विश्लेषण: 'चतुर्भुज रूप' ईश्वर की वह मर्यादा और सौम्यता है जिसे भक्त आसानी से हृदय में धारण कर सकता है। अर्जुन भगवान को विराट से वापस साकार रूप में आने को कह रहे हैं।


श्लोक 47

संस्कृत: मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌ । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌ ॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! तुझ पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति से यह अपना परम तेजोमय, अनंत और आदि विराट रूप तुझे दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था।

विश्लेषण: भगवान अर्जुन को सांत्वना दे रहे हैं कि यह रूप डराने के लिए नहीं, बल्कि कृपा (अनुग्रह) स्वरूप दिखाया गया है। यह उनकी विशेष कृपा का प्रमाण है।


श्लोक 48

संस्कृत: न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥

भावार्थ: हे कुरुप्रवीर! मनुष्य लोक में इस प्रकार के विश्वरूप वाला मैं न वेदों के अध्ययन से, न दान से, न यज्ञों से और न कठिन तपस्या से ही तेरे सिवा किसी और के द्वारा देखा जा सकता हूँ।

विश्लेषण: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर का साक्षात् दर्शन केवल किताबी ज्ञान या कर्मकांड से नहीं मिलता, बल्कि वह केवल अनन्य भक्ति और उनकी इच्छा पर निर्भर करता है।


श्लोक 49

संस्कृत: मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌। व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥

भावार्थ: मेरे इस विकराल रूप को देखकर तुझे व्याकुलता और मोह (भ्रम) नहीं होना चाहिए। अब तू भयरहित और प्रसन्न मन होकर मेरे उसी (चतुर्भुज) रूप को फिर से देख।

विश्लेषण: भगवान अपने भक्त के भय को देख नहीं पा रहे। वे पिता की तरह अर्जुन को धीरज बँधाते हैं और अपनी उग्रता को समेटकर सौम्य होने का वचन देते हैं।


श्लोक 50

संस्कृत: इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥

भावार्थ: संजय बोले- वासुदेव भगवान ने अर्जुन से ऐसा कहकर फिर वैसे ही अपना चतुर्भुज रूप दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्य रूप धारण करके भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

विश्लेषण: विराट रूप का पर्दा गिरता है और भगवान फिर से उस सुंदर, शांत और करुणामयी रूप में प्रकट होते हैं जिसे अर्जुन पहचानते हैं। यह भक्त की पुकार पर ईश्वर का कोमल होना है।

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