अध्याय 11 श्लोक 31 - 40 | विश्वरूपदर्शनयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

भगवान श्रीकृष्ण महाकाल के रूप में और अर्जुन उनके सामने हाथ जोड़कर बार-बार प्रणाम करते हुए।
"मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ; तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11 (श्लोक 31-40)

श्लोक 31

संस्कृत: आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌ ॥

भावार्थ: अर्जुन बोले- मुझे बतलाइए कि उग्ररूप वाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, आप प्रसन्न हों। मैं आपको (आदि पुरुष को) तत्व से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी चेष्टाओं (प्रवृत्ति) को नहीं समझ पा रहा हूँ।

विश्लेषण: भगवान के विनाशकारी रूप को देखकर अर्जुन चकित हैं। वे जानना चाहते हैं कि शांति का उपदेश देने वाले उनके सखा अचानक इतने भयंकर संहारक कैसे बन गए।


श्लोक 32

संस्कृत: कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

भावार्थ: श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ 'महाकाल' हूँ। इस समय मैं इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तेरे युद्ध न करने पर भी प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित ये सभी योद्धा जीवित नहीं रहेंगे।

विश्लेषण (अत्यंत महत्वपूर्ण): भगवान अपना परिचय 'काल' (Time) के रूप में देते हैं। वे अर्जुन को बता रहे हैं कि मृत्यु अटल है और इन योद्धाओं का समय पूरा हो चुका है।


श्लोक 33

संस्कृत: तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌ । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥

भावार्थ: इसलिए तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तू तो केवल 'निमित्तमात्र' (Instrument) बन जा।

विश्लेषण: भगवान स्पष्ट करते हैं कि नियति तय हो चुकी है। अर्जुन को केवल अपना कर्तव्य निभाना है ताकि उसे जीत का श्रेय मिले। 'निमित्त' बनना ही श्रेष्ठ भक्ति है।


श्लोक 34

संस्कृत: द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌ । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌ ॥

भावार्थ: द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, जयद्रथ, कर्ण और अन्य बहुत से शूरवीरों को, जो पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं, तू मार। भय मत कर, तू युद्ध में निश्चित ही शत्रुओं को जीतेगा।

विश्लेषण: अर्जुन को जिन महान योद्धाओं के वध का शोक था, भगवान ने दिखाया कि आध्यात्मिक तल पर उनका अंत पहले ही हो चुका है। अर्जुन को केवल भौतिक क्रिया करनी है।


श्लोक 35

संस्कृत: एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥

भावार्थ: संजय बोले- भगवान के इन वचनों को सुनकर अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, अत्यंत भयभीत होकर प्रणाम करके गद्गद वाणी में बोले।

विश्लेषण: भगवान की उग्रता और सत्य को जानकर अर्जुन का अहंकार पूरी तरह मिट गया है। वे अब पूरी तरह समर्पित और विनीत भाव में हैं।


श्लोक 36

संस्कृत: स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा:

भावार्थ: अर्जुन बोले- हे अंतर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम और गुणों के कीर्तन से जगत हर्षित हो रहा है और प्रेम को प्राप्त हो रहा है। राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं।

विश्लेषण: अर्जुन देख रहे हैं कि भगवान की सत्ता का प्रभाव कैसा है—भक्तों के लिए आनंद और बुराई के लिए वे काल रूप हैं।


श्लोक 37

संस्कृत: कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥

भावार्थ: हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त! हे देवेश! जो सत् (व्यक्त), असत् (अव्यक्त) और उनसे परे अक्षर (ब्रह्म) है, वह आप ही हैं।

विश्लेषण: अर्जुन भगवान को क्रिएटर (ब्रह्मा) से भी ऊपर मान रहे हैं। वे समझ गए हैं कि समस्त अस्तित्व का मूल आधार केवल श्रीकृष्ण ही हैं।


श्लोक 38

संस्कृत: त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥

भावार्थ: आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत के परम आश्रय हैं। आप ही जानने वाले (ज्ञाता) और जानने योग्य (ज्ञेय) हैं। हे अनन्तरूप! आपसे ही यह संपूर्ण जगत व्याप्त है।

विश्लेषण: 'परं निधानम्' का अर्थ है कि प्रलय के समय पूरा ब्रह्मांड भगवान में ही विलीन हो जाता है।


श्लोक 39

संस्कृत: वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥

भावार्थ: आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चंद्रमा और ब्रह्मा हैं और उनके भी पिता (प्रपितामह) हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! आपको बार-बार नमस्कार!

विश्लेषण: अर्जुन के पास अब भगवान की स्तुति के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। वे भावविभोर होकर बार-बार प्रणाम कर रहे हैं।


श्लोक 40

संस्कृत: नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥

भावार्थ: हे अनंत सामर्थ्य वाले! आपको आगे से, पीछे से और सब ओर से नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आप अनंत पराक्रमशाली हैं और समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सर्वरूप हैं।

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