अध्याय 11 श्लोक 21 - 30 | विश्वरूपदर्शनयोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी

भगवान श्रीकृष्ण का विकराल मुख जिसमें कौरव और पांडव पक्ष के योद्धा समा रहे हैं और अर्जुन भयभीत खड़े हैं।
"जैसे पतंगे आग में गिरते हैं, वैसे ही ये शूरवीर मृत्यु के मुख में समा रहे हैं।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 11 (श्लोक 21-30)

श्लोक 21

संस्कृत: अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति। स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥

भावार्थ: वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।

विश्लेषण: अर्जुन देख रहे हैं कि स्वर्ग के देवता भी इस विराट रूप को देखकर स्तब्ध हैं। कुछ भय के कारण प्रार्थना कर रहे हैं, तो कुछ ऋषि शांति की कामना करते हुए ईश्वर की महिमा गा रहे हैं।


श्लोक 22

संस्कृत: रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥

भावार्थ: जो रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितर तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं—वे सब ही विस्मित (हैरान) होकर आपको देख रहे हैं।

विश्लेषण: ब्रह्मांड की हर दिव्य और शक्तिशाली योनि के प्राणी इस समय भगवान के विश्वरूप के सामने छोटे प्रतीत हो रहे हैं और सभी विस्मय से भरे हुए हैं।


श्लोक 23

संस्कृत: रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌ । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌ ॥

भावार्थ: हे महाबाहो! आपके अनेक मुख, नेत्र, हाथ, जंघा, पैर और उदरों वाले तथा भयानक दाढ़ों के कारण अत्यंत विकराल रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल (भयभीत) हो रहा हूँ।

विश्लेषण: भगवान का यह रूप अब मोहक नहीं, बल्कि डरावना (विकराल) होता जा रहा है। अर्जुन की व्याकुलता बढ़ रही है क्योंकि वे विनाश के प्रतीक 'काल' रूप का दर्शन कर रहे हैं।


श्लोक 24

संस्कृत: नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌ । दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥

भावार्थ: हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाले, फैले हुए मुख और चमकते हुए विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अंतःकरण भयभीत है; मैं न धैर्य पा रहा हूँ और न शांति।

विश्लेषण: अर्जुन का साहस जवाब दे रहा है। भगवान का विस्तार इतना अधिक है कि अर्जुन को सिर छिपाने की भी जगह नहीं मिल रही। यहाँ 'विष्णु' संबोधन उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है।


श्लोक 25

संस्कृत: दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्टैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

भावार्थ: दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और न ही सुख मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।

विश्लेषण: अर्जुन पूरी तरह घबरा गए हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है मानो चारों ओर प्रलय की अग्नि जल रही हो। वे भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे अपने इस भयंकर रूप को शांत करें।


श्लोक 26

संस्कृत: अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥

भावार्थ: वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं के समूह, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धा—

विश्लेषण: (अगले श्लोक के साथ पूर्ण होता है) अर्जुन भविष्य देख रहे हैं कि युद्ध का परिणाम क्या होने वाला है।


श्लोक 27

संस्कृत: वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै ॥

भावार्थ: ये सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल और भयानक मुखों में बड़े वेग से प्रवेश कर रहे हैं और कई योद्धा चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में फंसे हुए दिख रहे हैं।

विश्लेषण: यह दृश्य अत्यंत वीभत्स और सत्य है। भगवान दिखा रहे हैं कि समय (काल) सबको खा जाता है। भीष्म और द्रोण जैसे अजेय योद्धा भी मृत्यु के मुख में समा रहे हैं।


श्लोक 28

संस्कृत: यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥

भावार्थ: जैसे नदियों के जल का प्रवाह स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर दौड़ता है, वैसे ही ये पृथ्वी के वीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

विश्लेषण: जैसे नदी का समुद्र में गिरना अनिवार्य है, वैसे ही हर जन्म लेने वाले का मृत्यु को प्राप्त होना निश्चित है। योद्धा अपनी वीरता के अहंकार में हैं, पर वे काल के ग्रास मात्र हैं।


श्लोक 29

संस्कृत: यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

भावार्थ: जैसे पतंगे अपने नाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में बड़ी तेजी से गिरते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए आपके मुखों में अत्यंत वेग से प्रवेश कर रहे हैं।

विश्लेषण: पतंगे को पता नहीं होता कि आग उसे जला देगी, वैसे ही मनुष्य संसार के मोह और युद्ध के उन्माद में अपनी मृत्यु की ओर भागा चला जा रहा है।


श्लोक 30

संस्कृत: लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥

भावार्थ: आप उन संपूर्ण लोकों को अपने प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए (निगलते हुए) सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश पूरे जगत को अपने तेज से तपा रहा है।

विश्लेषण: 'लेलिह्यसे' का अर्थ है स्वाद लेकर चाटना। काल रूपी ईश्वर सबको समाप्त कर रहे हैं और उनका प्रताप इतना उग्र है कि संपूर्ण सृष्टि उससे झुलस रही है।

टिप्पणियाँ