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| परमात्मा ही हर प्राणी के हृदय में स्थित आत्मा है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 10 (श्लोक 11-20)
श्लोक 11
संस्कृत: तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! उन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए, उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ।
विश्लेषण: जो भक्त प्रेम में डूबे रहते हैं, उनके मन के संशय और मोह को भगवान स्वयं भीतर से ज्ञान की ज्योति जलाकर मिटा देते हैं।
श्लोक 12
संस्कृत: परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। आपको सभी ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं।
विश्लेषण: अर्जुन यहाँ स्वीकार करते हैं कि श्रीकृष्ण केवल उनके मित्र नहीं, बल्कि वह सर्वोच्च सत्ता हैं जिसका वर्णन वेदों और ऋषियों ने किया है।
श्लोक 13
संस्कृत: आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥
भावार्थ: वैसे ही (जैसा पिछले श्लोक में कहा गया) देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी आपको वैसा ही कहते हैं और आप भी स्वयं मेरे प्रति वही कह रहे हैं।
विश्लेषण: अर्जुन अपनी बात की पुष्टि के लिए महान प्रमाणिक ऋषियों के नाम ले रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि उनकी श्रद्धा ठोस आधार पर है।
श्लोक 14
संस्कृत: सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥
भावार्थ: हे केशव! जो कुछ भी आप मुझसे कह रहे हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके इस लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही।
विश्लेषण: बुद्धि की अपनी एक सीमा है। अर्जुन कहते हैं कि बड़े-बड़े देवता और दानव भी आपकी लीला नहीं समझ सकते, इसे केवल आपकी कृपा से ही समझा जा सकता है।
श्लोक 15
संस्कृत: स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
भावार्थ: हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।
विश्लेषण: ईश्वर की गहराई को मापने वाला कोई दूसरा फीता नहीं है। परमात्मा स्वयं के ज्ञाता स्वयं ही हैं।
श्लोक 16
संस्कृत: वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
भावार्थ: इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को पूरी तरह से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
विश्लेषण: अर्जुन भगवान से निवेदन कर रहे हैं कि वे अपनी उन विशिष्ट शक्तियों का वर्णन करें जिनसे पूरा ब्रह्मांड संचालित है।
श्लोक 17
संस्कृत: कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥
भावार्थ: हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?
विश्लेषण: अर्जुन पूछ रहे हैं कि हे प्रभु, मैं दुनिया की किन-किन वस्तुओं या रूपों को देखकर आपके दिव्य स्वरूप का स्मरण करूँ?
श्लोक 18
संस्कृत: विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
भावार्थ: हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।
विश्लेषण: भगवान की महिमा सुनना अर्जुन के लिए अमृत पीने के समान है, जिससे उनकी जिज्ञासा और बढ़ती जा रही है।
श्लोक 19
संस्कृत: हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से (मुख्य-मुख्य) कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।
विश्लेषण: चूँकि परमात्मा अनंत हैं, इसलिए उनका पूरा वर्णन करना असंभव है। अतः वे केवल उन रूपों को बताएँगे जो सबसे अधिक प्रभावशाली हैं।
श्लोक 20
संस्कृत: अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।
विश्लेषण: यह विभूतियोग का सबसे प्रमुख सूत्र है। भगवान ने स्पष्ट कर दिया कि हर जीव के भीतर की चेतना और जगत की हर अवस्था स्वयं वही हैं।

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