अध्याय 10 श्लोक 21 - 30 | विभूतियोग | श्रीमद्भगवद्गीता हिंदी





भगवान श्रीकृष्ण के पीछे सूर्य, हिमालय, समुद्र और कामधेनु जैसे दिव्य प्रतीकों का चित्रण।
"मैं ही गणना करने वालों का समय हूँ और पशुओं में सिंह हूँ।"

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 10 (श्लोक 21-30)

श्लोक 21

संस्कृत: आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥

भावार्थ: मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ।

विश्लेषण: भगवान बता रहे हैं कि जहाँ भी प्रकाश और शक्ति की प्रधानता है, वह उन्हीं का रूप है। ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा की शीतलता उनके ऐश्वर्य को दर्शाती है।


श्लोक 22

संस्कृत: वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥

भावार्थ: मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ।

विश्लेषण: सामवेद अपनी गेयता (संगीत) के कारण श्रेष्ठ है, और मन इंद्रियों का राजा है। शरीर में जो 'होने' का अहसास या चेतना है, वह स्वयं परमात्मा है।


श्लोक 23

संस्कृत: रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥

भावार्थ: मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।

विश्लेषण: विनाश की शक्ति में वे कल्याणकारी शिव हैं और पर्वतों की ऊँचाई में वे अडिग सुमेरु हैं।


श्लोक 24

संस्कृत: पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥

भावार्थ: पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद (कार्तिकेय) और जलाशयों में समुद्र हूँ।

विश्लेषण: ज्ञान के नेतृत्व में वे देवगुरु बृहस्पति हैं और वीरता में महाबली कार्तिकेय। जल के असीम भंडार के रूप में वे सागर हैं।


श्लोक 25

संस्कृत: महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥

भावार्थ: मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ।

विश्लेषण: 'जप यज्ञ' को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि इसमें किसी बाहरी दिखावे या हिंसा की आवश्यकता नहीं होती। शब्दों का मूल 'ॐ' भी ईश्वर का ही स्वरूप है।


श्लोक 26

संस्कृत: अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥

भावार्थ: मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

विश्लेषण: पीपल (अश्वत्थ) की जड़ें और उसकी आयु उसे पूजनीय बनाती हैं। सिद्धियों के स्वामी के रूप में वे सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि हैं।


श्लोक 27

संस्कृत: उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ । एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥

भावार्थ: घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान।

विश्लेषण: समुद्र मंथन से निकली सर्वश्रेष्ठ वस्तुओं और समाज के नेतृत्व करने वाले 'राजा' में ईश्वर का ही अंश विद्यमान है।


श्लोक 28

संस्कृत: आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥

भावार्थ: मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ।

विश्लेषण: वज्र की अमोघ शक्ति और कामधेनु की सबको तृप्त करने वाली शक्ति ईश्वर की ही विभूतियाँ हैं।


श्लोक 29

संस्कृत: अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥

भावार्थ: मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ।

विश्लेषण: अनुशासन और शासन की पराकाष्ठा के रूप में वे यमराज हैं और जल की गहराई के नियंता वरुण हैं।


श्लोक 30

संस्कृत: प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥

भावार्थ: मैं दैत्य कुल में जन्मा भक्त प्रह्लाद और गणना करने वालों का 'समय' हूँ तथा पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ।

विश्लेषण: समय (काल) सबसे शक्तिशाली है जो सब कुछ बदल देता है, वह ईश्वर का ही रूप है। साथ ही, असुर कुल में भी जो भक्ति की पराकाष्ठा है (प्रह्लाद), वह परमात्मा की ही विभूति है।

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