भगवद्गीता अध्याय 4 (श्लोक 21-30): ब्रह्मार्पणं और विभिन्न यज्ञों के माध्यम से आत्म-शुद्धि

श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के प्रत्येक कर्म को यज्ञ के रूप में करने की शिक्षा दे रहे हैं।
यज्ञों के माध्यम से साधक अपने समस्त पापों और विकारों का नाश कर देता है।

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4 (श्लोक 21-30)

श्लोक 21

संस्कृत: निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ॥

भावार्थ: जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता।

विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कर्म बंधन मन से होता है। यदि मन में कोई आशा (Desire) न हो और संग्रह करने की प्रवृत्ति (Possessiveness) खत्म हो जाए, तो केवल शरीर द्वारा की गई क्रियाएं (जैसे जीवन निर्वाह के कर्म) मनुष्य को पाप-पुण्य के चक्र में नहीं फंसातीं।


श्लोक 22

संस्कृत: यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

भावार्थ: जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता।

विश्लेषण: इस श्लोक में कर्मयोगी के चार लक्षण बताए गए हैं: 1. जो मिल जाए उसमें संतोष, 2. ईर्ष्या का अभाव, 3. सुख-दुख के द्वंद्व से मुक्ति, और 4. सफलता-विफलता में समानता। ऐसा व्यक्ति कर्मों के परिणाम से मुक्त रहता है।


श्लोक 23

संस्कृत: गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

भावार्थ: जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं।

विश्लेषण: जब कोई व्यक्ति 'मैं' (अहंकार) को त्यागकर केवल कर्तव्य या सेवा (यज्ञ) के लिए कार्य करता है, तो उसके कर्मों का कोई भी व्यक्तिगत प्रभाव या 'कार्मिक फल' शेष नहीं रहता; वे ज्ञान में विलीन हो जाते हैं।


श्लोक 24

संस्कृत: ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्‌ । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

भावार्थ: जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं

विश्लेषण: यह अद्वैत दर्शन का शिखर है। ज्ञानी के लिए साधन, सामग्री, क्रिया और कर्ता—सब कुछ परमात्मा (ब्रह्म) ही है। जब दृष्टि इतनी विशाल हो जाती है, तो हर कर्म 'ब्रह्म' की ही अभिव्यक्ति बन जाता है।


श्लोक 25

संस्कृत: दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥

भावार्थ: दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं।

विश्लेषण: यहाँ दो प्रकार के साधकों की तुलना है: एक वे जो विधि-विधान से देवताओं की पूजा करते हैं, और दूसरे वे जो अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ एक मानकर ज्ञान के माध्यम से 'अभेद' भाव का यज्ञ करते हैं।


श्लोक 26

संस्कृत: श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥

भावार्थ: अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं।

विश्लेषण: संयम यज्ञ का अर्थ है अपनी इन्द्रियों को काबू में रखना। बुरा न सुनना, बुरा न देखना—यह इन्द्रियों को 'संयम की अग्नि' में अर्पित करना है, ताकि वे मन को विचलित न कर सकें।


श्लोक 27

संस्कृत: सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

भावार्थ: दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं।

विश्लेषण: यह गहन ध्यान की अवस्था है। इसमें साधक अपनी शारीरिक हलचल और श्वसन (प्राण) की क्रियाओं को रोककर अपने पूरे अस्तित्व को आत्मा के प्रकाश में एकाग्र कर देता है।


श्लोक 28

संस्कृत: द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥

भावार्थ: कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं।

विश्लेषण: श्रीकृष्ण यज्ञ की परिभाषा को व्यापक बनाते हैं। धन का दान करना, तप करना, योग अभ्यास करना, और शास्त्रों का अध्ययन करना—ये सभी 'यज्ञ' के ही अलग-अलग रूप हैं।


श्लोक 29

संस्कृत: अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥

भावार्थ: दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम में तत्पर रहते हैं।

विश्लेषण: यहाँ 'प्राणायाम' की साधना का वर्णन है। श्वास को लेना (पूरक), छोड़ना (रेचक) और रोकना (कुम्भक) भी भगवान की सेवा और आत्म-शुद्धि का एक मार्ग है।


श्लोक 30

संस्कृत: अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥

भावार्थ: दूसरे कितने ही नियमित आहार करने वाले पुरुष प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों के महत्व को जानने वाले हैं।

विश्लेषण: भोजन पर नियंत्रण (मितहार) भी एक तप है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भी व्यक्ति इन विभिन्न प्रकार के यज्ञों को समझकर निष्काम भाव से करता है, उसके जीवन के सारे कलुष (पाप और विकार) नष्ट हो जाते हैं।

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