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| जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही वास्तव में बुद्धिमान है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 4 (श्लोक 11-20)
श्लोक 11
संस्कृत: ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
अनुवाद: हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
विश्लेषण: भगवान यहाँ अपनी निष्पक्षता प्रकट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि परमात्मा का प्रेम सबके लिए समान है; आप उन्हें जिस भाव (पुत्र, मित्र, स्वामी या शत्रु) से देखते हैं, वे वैसे ही फल देते हैं। संसार के सभी रास्ते अंततः उन्हीं तक पहुँचते हैं।
श्लोक 12
संस्कृत: काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
अनुवाद: इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।
विश्लेषण: भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए लोग देवी-देवताओं की उपासना करते हैं, जिससे सांसारिक सफलता जल्दी मिल जाती है। परंतु, यह सफलता अस्थायी होती है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं करती।
श्लोक 13
संस्कृत: चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ॥
अनुवाद: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि का कर्ता होने पर भी मुझे वास्तव में अकर्ता ही जान।
विश्लेषण: वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि 'गुण और कर्म' (स्वभाव और कार्य) के आधार पर है। भगवान कहते हैं कि यद्यपि उन्होंने यह व्यवस्था बनाई है, फिर भी वे इसमें लिप्त नहीं हैं (अकर्ता हैं)।
श्लोक 14
संस्कृत: न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
अनुवाद: कर्मों के फल में मेरी स्पृहा (इच्छा) नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
विश्लेषण: श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि कर्म बंधन तब बनता है जब 'फल' की लालसा हो। जो व्यक्ति भगवान की तरह बिना किसी स्वार्थ के कर्म करना सीख जाता है, उसे कर्म का फल नहीं भोगना पड़ता।
श्लोक 15
संस्कृत: एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
अनुवाद: पूर्वकाल में मोक्ष की इच्छा रखने वालों ने भी इसी प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर।
विश्लेषण: श्रीकृष्ण अर्जुन को 'इतिहास' का उदाहरण देते हैं कि जनक जैसे मुमुक्षु (मोक्ष चाहने वाले) भी कर्मों के बीच रहकर ही मुक्त हुए थे। इसलिए अर्जुन को भी युद्ध रूपी कर्तव्य करना चाहिए।
श्लोक 16
संस्कृत: किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
अनुवाद: कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्मतत्व मैं तुझे समझाऊँगा, जिसे जानकर तू कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा।
विश्लेषण: कर्म की परिभाषा इतनी सरल नहीं है। बड़े-बड़े विद्वान भी सही और गलत कर्म के बीच का अंतर नहीं समझ पाते। श्रीकृष्ण यहाँ 'कर्म की सूक्ष्म गति' बताने का वचन देते हैं।
श्लोक 17
संस्कृत: कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
अनुवाद: कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, अकर्म का भी और विकर्म का भी; क्योंकि कर्म की गति बहुत गहन (जटिल) है।
विश्लेषण (तीन श्रेणियाँ):
कर्म: शास्त्रविहित कर्तव्य।
विकर्म: गलत या निषिद्ध कर्म (पाप)।
अकर्म: वह क्रिया जो फल पैदा न करे (निष्काम भाव)।
श्लोक 18
संस्कृत: कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
अनुवाद: जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है।
विश्लेषण (महामंत्र):
कर्म में अकर्म: शरीर काम कर रहा है, लेकिन मन फल में आसक्त नहीं है (मुक्त है)।
अकर्म में कर्म: शरीर चुपचाप बैठा है, लेकिन मन षड्यंत्र या इच्छाओं में लगा है (वह आलस्य भी एक कर्म है जो पाप बांध रहा है)।
श्लोक 19
संस्कृत: यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
अनुवाद: जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन पंडित कहते हैं।
विश्लेषण: सच्चा विद्वान (पंडित) वह है जिसके कर्म 'स्वार्थ' से नहीं निकलते। उसका ज्ञान एक अग्नि की तरह है जो कर्म के फलों (अच्छे-बुरे संस्कार) को पहले ही जला देता है।
श्लोक 20
संस्कृत: त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥
अनुवाद: जो पुरुष समस्त कर्मों और उनके फल में आसक्ति का त्याग करके परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
विश्लेषण: ऐसा व्यक्ति बाहरी तौर पर बहुत सक्रिय दिखता है, लेकिन अंदर से वह 'निर्लिप्त' है। वह संसार के सहारे (निराश्रय) के बिना केवल ईश्वर के सहारे तृप्त है।

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