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| श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सारा संसार वैसा ही करने लगता है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 3 (श्लोक 21-30)
श्लोक 21
संस्कृत: यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
अनुवाद: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।
विश्लेषण (आदर्श आचरण): यह श्लोक बताता है कि समाज में प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों (माता-पिता, गुरु, नेता) की जिम्मेदारी कितनी बड़ी है। आम लोग उपदेशों से नहीं, बल्कि बड़ों के 'आचरण' से सीखते हैं। यदि श्रेष्ठ व्यक्ति धर्म का पालन करता है, तो समाज स्वतः अनुशासित हो जाता है।
श्लोक 22
संस्कृत: न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
अनुवाद: हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ।
विश्लेषण (ईश्वर का कर्म): श्रीकृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हैं। भगवान के लिए कुछ भी पाना शेष नहीं है, फिर भी वे कर्म करते हैं। वे अर्जुन को सिखा रहे हैं कि कर्म केवल अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा बनाए रखने के लिए भी किया जाता है।
श्लोक 23
संस्कृत: यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
अनुवाद: क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
विश्लेषण (अनुकरण का भय): श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे आलसी हो जाएं या कर्म त्याग दें, तो संसार के लोग भी उन्हीं का बहाना बनाकर निकम्मे हो जाएंगे। चूँकि लोग भगवान को अपना आदर्श मानते हैं, इसलिए उन्हें निरंतर सही कर्म करते रहना पड़ता है।
श्लोक 24
संस्कृत: यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
अनुवाद: इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।
विश्लेषण (सामाजिक व्यवस्था): यदि नेतृत्व करने वाला व्यक्ति अपना कर्तव्य छोड़ दे, तो समाज में अव्यवस्था (संकरता) फैल जाती है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि अराजकता से प्रजा का नाश होता है, और वे इस पाप के भागीदार नहीं बनना चाहते।
श्लोक 25
संस्कृत: सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
अनुवाद: हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे।
विश्लेषण (विद्वान का कर्तव्य): अज्ञानी फल के लिए मेहनत करता है, जबकि ज्ञानी को समाज कल्याण (लोकसंग्रह) के लिए वैसी ही मेहनत करनी चाहिए। अंतर केवल भाव का है—अज्ञानी बंधा हुआ है, और ज्ञानी मुक्त है।
श्लोक 26
संस्कृत: न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
अनुवाद:
परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
विश्लेषण (बुद्धिभेद न करना): ज्ञानी को दूसरों का उत्साह नहीं तोड़ना चाहिए। यदि कोई फल के लालच में भी काम कर रहा है, तो उसे सीधे 'कर्म छोड़ने' को नहीं कहना चाहिए, बल्कि खुद अच्छा काम करके उसे सही दिशा में प्रेरित करना चाहिए।
श्लोक 27
संस्कृत: प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
अनुवाद: वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।
विश्लेषण (अहंकार): शरीर और मन के सारे कार्य प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) से होते हैं। लेकिन अज्ञानी अपनी पहचान शरीर से कर लेता है और सोचता है कि "मैं कर रहा हूँ।" यही 'कर्तापन' का अहंकार बंधन है।
श्लोक 28
संस्कृत: तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्म विभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
अनुवाद: परंतु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
विश्लेषण (तत्व का ज्ञान): ज्ञानी जानता है कि इन्द्रियाँ (गुण) अपने विषयों (गुणों) में काम कर रही हैं। वह स्वयं को आत्मा के रूप में इन सब क्रियाओं का साक्षी (Observer) मानता है, इसलिए वह कर्म के फल में नहीं फंसता।
श्लोक 29
संस्कृत: प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
अनुवाद: प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे।
विश्लेषण (धैर्य): जो लोग माया में फंसे हैं, ज्ञानी को उनके प्रति दया भाव रखना चाहिए। उन्हें झटके से ज्ञान देने के बजाय धीरे-धीरे विकसित होने देना चाहिए ताकि वे भ्रमित न हों।
श्लोक 30
संस्कृत: मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
अनुवाद: मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर।
विश्लेषण (परम आदेश): श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध का मंत्र देते हैं—सारे कर्म भगवान को सौंप दो (अर्पण), कल की चिंता छोड़ो (निराशीः), "मेरा-तेरा" भूल जाओ (निर्ममः) और मन के तनाव को दूर करके अपना कर्तव्य पूरा करो।

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