भगवद्गीता अध्याय 2 (61-72): पतन की सीढ़ी और स्थितप्रज्ञ की ब्राह्मी स्थिति

एक शांत योगी की छवि जो समुद्र की तरह स्थिर है, साथ ही क्रोध से बुद्धि नाश का चक्र।
"अशांतस्य कुतः सुखम्"—जो व्यक्ति मन से अशांत है, उसे सुख कहाँ से मिल सकता है?

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2 (श्लोक 61-72)

श्लोक 61

संस्कृत: तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।61।।

विश्लेषण: यहाँ श्रीकृष्ण साधना का सूत्र देते हैं। केवल इन्द्रियों को दबाना काफी नहीं है, बल्कि मन को किसी ऊँचे लक्ष्य (परमात्मा) में लगाना आवश्यक है। 'मत्परः' का अर्थ है—मुझमें परायण होकर। जब इन्द्रियाँ वश में होती हैं, तभी बुद्धि स्थिर होती है।


श्लोक 62-63 (पतन की सीढ़ी)

संस्कृत: ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।62।। क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।63।।

विश्लेषण: ये दो श्लोक मनोविज्ञान (Psychology) के मास्टरक्लास हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य का पतन कैसे होता है:

  1. चिन्तन: किसी विषय के बारे में सोचना।

  2. आसक्ति (Attachment): सोचने से लगाव पैदा होना।

  3. काम (Desire): लगाव से उसे पाने की इच्छा।

  4. क्रोध (Anger): इच्छा पूरी न होने पर गुस्सा।

  5. सम्मोह (Delusion): गुस्से से विवेक (सही-गलत की समझ) खो जाना।

  6. स्मृति-विभ्रम: विवेक खोने से गुरुओं की शिक्षा और अपनी गरिमा भूल जाना।

  7. बुद्धिनाश: सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म होना।

  8. सर्वनाश: मनुष्य का आध्यात्मिक पतन।


श्लोक 64-65

संस्कृत: रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।।64।। प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।।65।।

विश्लेषण: यहाँ समाधान दिया गया है। इन्द्रियों को विषयों से पूरी तरह काटना असंभव है, इसलिए तरीका यह है कि राग और द्वेष (पसंद और नापसंद) को छोड़ दिया जाए। जब आप तटस्थ होकर दुनिया में विचरण करते हैं, तो आपको 'प्रसाद' (आंतरिक शांति) मिलता है, जिससे सभी दुखों का अंत हो जाता है।


श्लोक 66

संस्कृत: नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।।66।।

विश्लेषण: श्रीकृष्ण सुख का गणित समझाते हैं। यदि इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, तो बुद्धि स्थिर नहीं होगी। बिना स्थिर बुद्धि के श्रेष्ठ भावना (उच्च विचार) नहीं आ सकती। बिना ऊँचे विचारों के शांति नहीं मिलेगी, और जो अशांत है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता।


श्लोक 67-68

संस्कृत: इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।67।। तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।68।।

विश्लेषण: जैसे पानी में चलती नाव को तेज हवा बहा ले जाती है, वैसे ही भटकती हुई इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय अगर मन को अपनी ओर खींच ले, तो वह पूरी बुद्धि को नष्ट कर सकती है। इसलिए पूर्ण नियंत्रण ही स्थिरता की कुंजी है।


श्लोक 69

संस्कृत: या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।।69।।

विश्लेषण: यह एक अद्भुत रूपक (Metaphor) है। जो आम लोगों के लिए रात है (आध्यात्मिकता, आत्मज्ञान), उसमें योगी जागता है। और जिसमें आम लोग जागते हैं (सांसारिक भोग, लालच), वह योगी के लिए रात (व्यर्थ) के समान है। यानी योगी और संसारी की प्राथमिकताएँ बिल्कुल विपरीत होती हैं।


श्लोक 70

संस्कृत: आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ।।70।।

विश्लेषण: यहाँ समुद्र का उदाहरण दिया गया है। नदियाँ समुद्र में गिरती हैं, लेकिन समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, न ही उसका स्तर बदलता है। इसी प्रकार, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के पास भोग-विलास आते तो हैं, लेकिन वे उसके मन में कोई हलचल पैदा नहीं कर पाते। वही व्यक्ति सुखी है जो भोगों का गुलाम नहीं है।


श्लोक 71-72 (उपसंहार)

संस्कृत: विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।।71।। एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।72।।

विश्लेषण: अध्याय का समापन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति 'ममता' (मेरा-तेरा) और 'अहंकार' (मैं) को छोड़ देता है, वही परम शांति को प्राप्त होता है। इसे 'ब्राह्मी स्थिति' कहते हैं। यदि कोई मृत्यु के क्षण में भी इस स्थिति को प्राप्त कर ले, तो वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है।

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