भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 31-40: स्वधर्म का पालन और कर्मयोग की शक्ति

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए खड़े होने और निष्काम भाव से कर्म करने की प्रेरणा देते हुए

सुख-दुख और हार-जीत को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; यही कर्मों के बंधन से मुक्ति का मार्ग है।




श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2 (श्लोक 31-40)

श्लोक 31

संस्कृत: स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।।31।।

अनुवाद: तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।

विश्लेषण (स्वधर्म का महत्व): आत्मा के दार्शनिक ज्ञान के बाद, श्रीकृष्ण अब अर्जुन को उसके सामाजिक और नैतिक कर्तव्य (स्वधर्म) की याद दिलाते हैं। एक क्षत्रिय का मुख्य गुण है समाज की रक्षा और न्याय की स्थापना। श्रीकृष्ण तर्क देते हैं कि यदि युद्ध धर्म की रक्षा के लिए है, तो वह क्षत्रिय का सबसे बड़ा तप है। अपने कर्तव्य से भागना आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से गलत है।


श्लोक 32

संस्कृत: यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ।।32।।

अनुवाद: हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।

विश्लेषण (अवसर की दुर्लभता): श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह युद्ध अर्जुन ने स्वयं नहीं माँगा, बल्कि यह धर्म की रक्षा के लिए 'यदृच्छया' (अपने-आप) प्राप्त हुआ है। ऐसे युद्ध को 'स्वर्ग का खुला द्वार' माना जाता है। केवल वही योद्धा भाग्यशाली होते हैं जिन्हें अन्याय के विरुद्ध लड़ने का ऐसा स्पष्ट और महान अवसर मिलता है।


श्लोक 33

संस्कृत: अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।।33।।

अनुवाद: किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।

विश्लेषण (कर्तव्य त्याग का परिणाम): यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को चेतावनी देते हैं। यदि वह युद्ध से पीछे हटता है, तो इसे 'करुणा' नहीं बल्कि 'कर्तव्य से पलायन' माना जाएगा। इससे उसकी 'कीर्ति' (सम्मान) नष्ट होगी और अपने स्वधर्म का पालन न करने के कारण उसे 'पाप' लगेगा। धर्म को जानते हुए भी उसका साथ न देना भी एक बड़ा अपराध है।


श्लोक 34

संस्कृत: अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ।।34।।

अनुवाद: तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है।

विश्लेषण (अपमान और मृत्यु): एक महान योद्धा के लिए उसका सम्मान उसके प्राणों से भी बढ़कर होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन भाग जाता है, तो इतिहास उसे एक कायर के रूप में याद रखेगा। एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए अपमान सहना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होता है।


श्लोक 35

संस्कृत: भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ।।35।।

अनुवाद: और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे।

विश्लेषण (दूसरों की दृष्टि): अर्जुन सोच रहा था कि वह करुणा के कारण युद्ध छोड़ रहा है, लेकिन श्रीकृष्ण उसे वास्तविकता दिखाते हैं। भीष्म, कर्ण और अन्य महारथी यह सोचेंगे कि अर्जुन 'भय' (डर) के कारण मैदान छोड़कर भागा है। जो लोग उसका सम्मान करते थे, वे उसे तुच्छ समझने लगेंगे।


श्लोक 36

संस्कृत: अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ।।36।।

अनुवाद: तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?

विश्लेषण (शत्रु की निंदा): शत्रु जब किसी वीर की क्षमता पर सवाल उठाते हैं और उसका मजाक उड़ाते हैं, तो वह पीड़ा किसी भी शारीरिक चोट से बड़ी होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को मानसिक रूप से तैयार कर रहे हैं कि उसका निर्णय उसे कितनी मानसिक यंत्रणा दे सकता है।


श्लोक 37

संस्कृत: हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।।37।।

अनुवाद: या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा।

विश्लेषण (दोनों हाथों में लड्डू): श्रीकृष्ण एक स्पष्ट 'जीत-जीत' (Win-Win) स्थिति प्रस्तुत करते हैं। यदि अर्जुन युद्ध में वीरगति को प्राप्त होता है, तो उसे स्वर्ग मिलेगा। यदि वह जीतता है, तो पृथ्वी का राज्य। इसलिए, किसी भी परिणाम में हानि नहीं है। यहाँ वे अर्जुन को प्रसिद्ध आदेश देते हैं— "तस्मादुत्तिष्ठ" (इसलिए खड़े हो जाओ)।


श्लोक 38

संस्कृत: सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।38।।

अनुवाद: जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा।

विश्लेषण (समत्व भाव): यह श्लोक कर्मयोग की ओर पहला कदम है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि युद्ध केवल इसलिए करो क्योंकि वह तुम्हारा कर्तव्य है, न कि लाभ या जीत की लालसा में। जब तुम सुख-दुख और हार-जीत में समान भाव रखते हो, तो तुम कर्म के फल से नहीं बंधते और तुम्हें पाप नहीं लगता। यह 'निष्काम कर्म' का बीज है।


श्लोक 39

संस्कृत: एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।39।।

अनुवाद: हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग (सांख्य) के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के विषय में सुन—जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा।

विश्लेषण (ज्ञान से कर्म की ओर): अब तक श्रीकृष्ण ने 'सांख्य' (आत्मा का ज्ञान) के माध्यम से अर्जुन को समझाया। अब वे व्यावहारिक 'योग' या 'कर्मयोग' की बात शुरू कर रहे हैं। वे वादा करते हैं कि यदि अर्जुन इस बुद्धि (दृष्टिकोण) को अपना लेगा, तो वह काम करते हुए भी कर्मों के बंधन (फल की चिंता और जन्म-मृत्यु का चक्र) से मुक्त हो जाएगा।


श्लोक 40

संस्कृत: यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।40।।

अनुवाद: इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है।

विश्लेषण (कर्मयोग की महिमा): भौतिक कार्यों में यदि कार्य पूरा न हो, तो मेहनत बेकार जाती है। लेकिन कर्मयोग (निष्काम भाव से किया गया कार्य) में किया गया थोड़ा सा भी प्रयास कभी नष्ट नहीं होता। इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होता और यह व्यक्ति को जीवन के सबसे बड़े डर (मृत्यु और अनिश्चितता) से बचाने की शक्ति रखता है।

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