श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2 (श्लोक 21-30)
श्लोक 21
संस्कृत: वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ।।21।।
अनुवाद: हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
विश्लेषण (अकर्ता भाव): श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन के 'कर्ता' होने के अहंकार पर चोट कर रहे हैं। जब आत्मा अविनाशी है, तो वध की क्रिया केवल शरीर के स्तर पर एक भौतिक घटना मात्र है। जो व्यक्ति आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह समझ जाता है कि न तो वह किसी का वध कर सकता है और न ही किसी के वध का कारण बन सकता है। यहाँ 'अव्यय' शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है जिसमें कोई विकार या कमी न आए।
श्लोक 22
संस्कृत: वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।22।।
अनुवाद: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
विश्लेषण (वस्त्र का उदाहरण): यह गीता के सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है। मृत्यु को यहाँ अत्यंत सरल रूप में 'कपड़े बदलना' बताया गया है। जैसे फटे या पुराने कपड़े छोड़ते समय हमें दुख नहीं होता क्योंकि हमें पता है कि हम नए कपड़े पहनेंगे, वैसे ही आत्मा जीर्ण (बूढ़े या बेकार) शरीर को छोड़कर नई यात्रा शुरू करती है। यह श्लोक मृत्यु के प्रति मानवीय दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल देता है—डर को हटाकर इसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया बना देता है।
श्लोक 23
संस्कृत: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।23।।
अनुवाद: इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता।
विश्लेषण (तत्वों से परे): प्रकृति के चार मुख्य तत्व (अस्त्र, अग्नि, जल और वायु) पदार्थ को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन चेतना (आत्मा) को नहीं। तलवार पदार्थ को काटती है, आग पदार्थ को जलाती है, लेकिन आत्मा 'अपदार्थ' (Non-matter) है। यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि युद्ध के मैदान में चल रहे अस्त्र-शस्त्र केवल शरीरों को नष्ट कर रहे हैं, उस मूल तत्व को नहीं जिसे अर्जुन बचाना चाहता है।
श्लोक 24
संस्कृत: अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।24।।
अनुवाद: क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
विश्लेषण (आत्मा के गुण): पिछले श्लोक की बात को दोहराते हुए श्रीकृष्ण आत्मा की स्थिरता पर जोर देते हैं। यहाँ 'सर्वगतः' (सर्वव्यापी) और 'स्थाणुः' (स्थिर) शब्द महत्वपूर्ण हैं। आत्मा कहीं आती-जाती नहीं है क्योंकि वह हर जगह मौजूद है। जो तत्व पहले से ही हर जगह है और हमेशा से है (सनातन), उसे हिलाया या नष्ट नहीं किया जा सकता।
श्लोक 25
संस्कृत: अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।।25।।
अनुवाद: यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है।
विश्लेषण (ज्ञान से शोक की निवृत्ति): आत्मा 'अव्यक्त' है (दिखाई नहीं देती) और 'अचिन्त्य' है (बुद्धि से पूरी तरह समझी नहीं जा सकती)। अर्जुन की समस्या यह थी कि वह केवल 'व्यक्त' (दिखने वाले शरीर) को देख रहा था। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब तुम उस तत्व को पहचान लोगे जो कभी बदलता नहीं (अविकार्य), तो तुम्हारा शोक अपने आप समाप्त हो जाएगा। शोक केवल 'परिवर्तन' के कारण होता है, और आत्मा अपरिवर्तनीय है।
श्लोक 26
संस्कृत: अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।।26।।
अनुवाद: किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है।
विश्लेषण (तार्किक दृष्टिकोण): श्रीकृष्ण यहाँ एक अलग तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि मान लो तुम आत्मा की अमरता को नहीं मानते और यह मानते हो कि जन्म के साथ जीवन शुरू होता है और मृत्यु के साथ खत्म (भौतिकवादी सोच), तो भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि जन्म और मृत्यु एक निरंतर चलने वाला प्राकृतिक नियम है, तो उसे बदला नहीं जा सकता, और जो बदला नहीं जा सकता उस पर दुख करना व्यर्थ है।
श्लोक 27
संस्कृत: जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।27।।
अनुवाद: क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है।
विश्लेषण (अनिवार्यता का नियम): यह जीवन का कड़वा सत्य है। जो पैदा हुआ है, वह मरेगा ही (ध्रुवो मृत्युः)। यह एक चक्र है जिसे टाला नहीं जा सकता ('अपरिहार्ये')। श्रीकृष्ण अर्जुन को वास्तविकता का सामना करने के लिए कह रहे हैं—जो अनिवार्य है, उसके विरुद्ध रोना केवल अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना है।
श्लोक 28
संस्कृत: अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ।।28।।
अनुवाद: हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
विश्लेषण (दृश्य और अदृश्य): श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्राणियों का अस्तित्व एक फिल्म की तरह है। फिल्म शुरू होने से पहले अंधेरा था, फिल्म खत्म होने के बाद अंधेरा होगा, केवल बीच में दृश्य दिखाई देते हैं। हमारा अस्तित्व भी जन्म से पहले और मृत्यु के बाद 'अव्यक्त' (अदृश्य) रहता है। हम केवल इस छोटे से 'व्यक्त' अंतराल के लिए इतना मोह क्यों करते हैं? यह श्लोक हमें जीवन की क्षणभंगुरता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की शिक्षा देता है।
श्लोक 29
संस्कृत: आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।।29।।
अनुवाद: कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता।
विश्लेषण (आत्मा का रहस्य): आत्मा का ज्ञान इतना सूक्ष्म है कि यह सबके लिए एक 'आश्चर्य' जैसा है। बहुत से लोग इसके बारे में पढ़ते या सुनते हैं, लेकिन इसे अनुभव (Realize) बहुत कम लोग कर पाते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वह जो भ्रम महसूस कर रहा है, वह स्वाभाविक है क्योंकि इस महान सत्य को समझना अत्यंत कठिन है।
श्लोक 30
संस्कृत: देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ।।30।।
अनुवाद: हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है।
विश्लेषण (अंतिम निष्कर्ष): आत्मा के विषय में चल रहे इस खंड का श्रीकृष्ण यहाँ समापन करते हैं। वे स्पष्ट कर देते हैं कि 'देही' (आत्मा) हर शरीर में 'अवध्य' (Indestructible) है। चाहे वह भीष्म हों, द्रोण हों या कोई भी सैनिक—उनका मूल स्वरूप नष्ट नहीं हो सकता। इसलिए अर्जुन को अपना कर्तव्य (युद्ध) करने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि वह किसी का वास्तविक विनाश नहीं कर रहा है।

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