| आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है; शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 2 (श्लोक 11-20)
श्लोक 11
संस्कृत: अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ।।11।।
अनुवाद: श्री भगवान बोले: हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते।
विश्लेषण (ज्ञान की पहली किरण): श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन के पाखंड को उजागर करते हैं। अर्जुन बातें तो ज्ञानियों (पंडितों) जैसी कर रहा था, लेकिन उसका आचरण अज्ञानियों जैसा था। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो वास्तव में ज्ञानी हैं, वे जानते हैं कि जीवन और मृत्यु केवल एक चक्र है, इसलिए वे न तो जीवित के लिए मोह रखते हैं और न ही मृत के लिए शोक करते हैं। यह श्लोक बताता है कि 'अज्ञान' ही सभी दुखों की जड़ है।
श्लोक 12
संस्कृत: न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।12।।
अनुवाद: न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
विश्लेषण (आत्मा की नित्यता): यहाँ श्रीकृष्ण 'पुनर्जन्म' और 'अमरता' के सिद्धांत की नींव रखते हैं। वे कहते हैं कि अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता। हम कल भी थे, आज भी हैं और शरीर बदलने के बाद कल भी रहेंगे। मृत्यु केवल एक पड़ाव है, अंत नहीं। यह श्लोक अर्जुन के उस डर को खत्म करता है कि वह अपने परिजनों को 'खत्म' कर देगा।
श्लोक 13
संस्कृत: देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।।13।।
अनुवाद: जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।
विश्लेषण (शरीर परिवर्तन का उदाहरण): श्रीकृष्ण एक बहुत ही सरल उदाहरण देते हैं। जैसे हमारा शरीर बचपन से जवानी और फिर बुढ़ापे में बदल जाता है, लेकिन हम वही रहते हैं, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा केवल पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है। जैसे हम बचपन के खत्म होने पर शोक नहीं मनाते, वैसे ही मृत्यु पर भी शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 14
संस्कृत: मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।14।।
अनुवाद: हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर।
विश्लेषण (तितिक्षा - सहनशीलता): श्रीकृष्ण समझाते हैं कि सुख और दुख केवल इन्द्रियों के अनुभव हैं, जैसे मौसम बदलता है। सर्दी के बाद गर्मी आती है, वैसे ही दुख के बाद सुख आएगा। ये सब 'अनित्य' (अस्थायी) हैं। इसलिए, एक योद्धा और साधक को इन्हें बिना विचलित हुए सहन करना सीखना चाहिए। इसे 'तितिक्षा' कहा गया है।
श्लोक 15
संस्कृत: यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।15।।
अनुवाद: क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है।
विश्लेषण (मोक्ष का मार्ग): अमरता या मोक्ष उसे मिलता है जो सुख और दुख में स्थिर रहता है। यदि आप सुख में बहुत खुश और दुख में बहुत दुखी होते हैं, तो आप इन्द्रियों के गुलाम हैं। जो व्यक्ति इन दोनों के बीच 'सम' (संतुलित) रहना सीख जाता है, वही वास्तव में आध्यात्मिक उन्नति के योग्य है।
श्लोक 16
संस्कृत: नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।16।।
अनुवाद: असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।
विश्लेषण (सत् और असत् का भेद): यह दर्शन का बहुत गहरा श्लोक है। 'असत्' वह है जो बदलता रहता है (जैसे शरीर, भावनाएं, संसार)—इसकी कोई स्थायी सत्ता नहीं है। 'सत्' वह है जो कभी नहीं बदलता (जैसे आत्मा या सत्य)—इसका कभी अभाव नहीं होता। ज्ञानी वही है जो बदलती हुई चीजों में न उलझकर उस 'सत्य' को देख सके जो कभी नहीं बदलता।
श्लोक 17
संस्कृत: अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।।17।।
अनुवाद: नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्-दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
विश्लेषण (अविनाशी तत्व): श्रीकृष्ण उस 'चेतना' या 'परमात्मा' की बात कर रहे हैं जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। वह तत्व इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि उसे कोई शस्त्र, कोई विचार या कोई शक्ति नष्ट नहीं कर सकती। अर्जुन जिस विनाश से डर रहा था, श्रीकृष्ण उसे बता रहे हैं कि वास्तविक 'सत्य' का विनाश संभव ही नहीं है।
श्लोक 18
संस्कृत: अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।।18।।
अनुवाद: इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर।
विश्लेषण (युद्ध का आदेश): श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि शरीर का अंत निश्चित है (अन्तवन्तः), लेकिन शरीर के भीतर रहने वाली आत्मा अनंत है। चूँकि शरीर को तो एक दिन मरना ही है और आत्मा मर नहीं सकती, इसलिए अर्जुन को अपने 'क्षत्रिय धर्म' का पालन करते हुए युद्ध करना चाहिए। यहाँ श्रीकृष्ण आत्मा के ज्ञान का उपयोग कर्तव्य की प्रेरणा देने के लिए कर रहे हैं।
श्लोक 19
संस्कृत: य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।।19।।
अनुवाद: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है।
विश्लेषण (कर्तापन का भ्रम): यह श्लोक अर्जुन के उस भ्रम को तोड़ता है कि वह 'मारने वाला' है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो सोचता है कि उसने किसी को मार दिया, वह अज्ञानी है। आत्मा न तो मारी जाती है और न ही किसी को मारती है। मृत्यु केवल भौतिक स्तर पर एक क्रिया है, आध्यात्मिक स्तर पर आत्मा अछूती रहती है।
श्लोक 20
संस्कृत: न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।20।।
अनुवाद: यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
विश्लेषण (आत्मा की परिभाषा): यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। इसमें आत्मा के छः गुणों को बताया गया है:
अजः (अजन्मा): इसका जन्म नहीं होता।
नित्यः: यह हमेशा रहता है।
शाश्वतः: यह अपरिवर्तनीय है।
पुराणः: यह सबसे पुराना है फिर भी हमेशा नया है।
न हन्यते: इसका वध नहीं किया जा सकता।
अविकारी: यह कभी बदलता नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जिसे वह मारने से डर रहा है, वह तत्व वास्तव में वध के परे है।
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