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| मैं ही सबका आदि कारण हूँ; मुझसे ही यह संपूर्ण जगत चेष्टा करता है। |
श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 9 (श्लोक 21-34)
श्लोक 21
संस्कृत: ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
भावार्थ: वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में वापस आते हैं। इस प्रकार कामनाओं वाले पुरुष बार-बार स्वर्ग जाते हैं और वापस आते हैं।
विश्लेषण: स्वर्ग का सुख 'क्रेडिट कार्ड' की तरह है। जब तक आपके खाते में 'पुण्य' है, आप वहाँ रह सकते हैं, लेकिन जैसे ही पुण्य खत्म होता है, वापस धरती पर आना पड़ता है। यह वास्तविक मुक्ति नहीं है।
श्लोक 22
संस्कृत: अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
भावार्थ: जो अनन्य भक्त निरंतर मेरा चिंतन करते हुए मुझे भजते हैं, उन नित्य मुझमें जुड़े हुए भक्तों का 'योगक्षेम' (जो उनके पास नहीं है उसे देना और जो है उसकी रक्षा करना) मैं स्वयं वहन करता हूँ।
विश्लेषण (भगवान का परम आश्वासन): यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। भगवान कहते हैं कि जो पूरी तरह उन पर निर्भर है, उसकी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों जिम्मेदारियाँ भगवान संभाल लेते हैं।
श्लोक 23
संस्कृत: येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जो भक्त श्रद्धा से अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी वास्तव में मुझे ही पूजते हैं, लेकिन उनका वह तरीका अज्ञानपूर्वक (गलत विधि) है।
विश्लेषण: जैसे सारी नदियाँ अंत में समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही हर पूजा परमात्मा तक पहुँचती है। पर देवताओं की पूजा करना सीधे केंद्र को न पूजकर शाखाओं को पूजने जैसा है।
श्लोक 24
संस्कृत: अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
भावार्थ: क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। लेकिन वे मुझे तत्व से नहीं जानते, इसलिए वे बार-बार जन्म-मृत्यु में गिरते हैं।
विश्लेषण: जब हम यह नहीं समझते कि शक्ति का मूल स्रोत केवल एक परमात्मा है, तब तक हम छोटे-छोटे सुखों के लिए भटकते रहते हैं और मोक्ष नहीं पा सकते।
श्लोक 25
संस्कृत: यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
भावार्थ: देवताओं को पूजने वाले देवताओं को, पितरों को पूजने वाले पितरों को और भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं। लेकिन मेरा पूजन करने वाले मुझे (परमात्मा को) प्राप्त होते हैं।
विश्लेषण: 'जैसी भक्ति वैसी गति'। आप जिसकी पूजा करेंगे, अंत में उसी के पास जाएँगे। इसलिए सर्वोच्च लक्ष्य (परमात्मा) को ही चुनना बुद्धिमानी है।
श्लोक 26
संस्कृत: पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
भावार्थ: जो कोई भक्त प्रेम से मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल भी अर्पण करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त के उस प्रेम भरे उपहार को मैं स्वीकार करता हूँ।
विश्लेषण (सहज भक्ति): भगवान को कीमती सामान नहीं, 'भाव' चाहिए। एक साधारण तुलसी का पत्ता भी यदि प्रेम से दिया जाए, तो वह छप्पन भोग से बड़ा है।
श्लोक 27
संस्कृत: यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! तू जो भी कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मुझे अर्पित कर दे।
विश्लेषण: भक्ति केवल पूजा घर तक सीमित नहीं है। अपने जीवन के हर छोटे-बड़े काम को भगवान की सेवा मानकर करना ही असली सन्यास योग है।
श्लोक 28
संस्कृत: शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
भावार्थ: इस प्रकार सब कुछ मुझे अर्पण करने से तू अच्छे-बुरे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाएगा और मुझे प्राप्त होगा।
विश्लेषण: जब हम काम के फल को खुद न लेकर भगवान को सौंप देते हैं, तो कर्म का 'दाग' हमें नहीं छू पाता। यह कर्म से मुक्ति का सरलतम मार्ग है।
श्लोक 29
संस्कृत: समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
भावार्थ: मैं सब भूतों में समान हूँ, न मेरा कोई दुश्मन है न प्यारा। लेकिन जो प्रेम से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।
विश्लेषण: जैसे धूप सबके लिए बराबर है, पर जो खिड़की खोलेगा उसे ही रोशनी मिलेगी। भगवान सबके लिए समान हैं, पर भक्त अपने प्रेम से उन्हें अपने हृदय में प्रकट कर लेता है।
श्लोक 30
संस्कृत: अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
भावार्थ: यदि कोई बहुत दुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे 'साधु' ही मानना चाहिए, क्योंकि उसका निश्चय अब सही है।
विश्लेषण: भक्ति में इतना सामर्थ्य है कि वह पापी को भी संत बना सकती है। एक बार जब व्यक्ति भगवान की शरण ले लेता है, तो उसका अतीत मिट जाता है और नया जीवन शुरू होता है।
श्लोक 31
संस्कृत: क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
भावार्थ: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और परम शांति को पाता है। हे अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि 'मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता'।
विश्लेषण: यह भगवान का सबसे बड़ा वचन है। भक्ति मार्ग पर चलने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती। गलतियाँ होने पर भी भगवान उसे थाम लेते हैं।
श्लोक 32
संस्कृत: मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
भावार्थ: हे अर्जुन! जो कोई भी मेरी शरण लेता है—चाहे वे समाज द्वारा तिरस्कृत हों या किसी भी वर्ग के—वे सभी परम गति को प्राप्त होते हैं।
विश्लेषण: भगवान के यहाँ कोई जाति, लिंग या भेदभाव नहीं है। उनकी शरण सबके लिए खुली है। योग्यता केवल एक है—'शरणगति'।
श्लोक 33
संस्कृत: किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
भावार्थ: जब पापयोनियाँ भी मुझे पा सकती हैं, तो फिर पुण्यशाली ब्राह्मणों और राजर्षि भक्तों का तो कहना ही क्या! इसलिए इस अनित्य और सुखरहित संसार में मुझे ही भज।
विश्लेषण: संसार 'अनित्य' (अस्थायी) और 'असुख' (दुखपूर्ण) है। यहाँ सुख ढूंढना रेत में तेल ढूंढने जैसा है। इसलिए समय व्यर्थ न गँवाकर परमात्मा का आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 34
संस्कृत: मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
भावार्थ: मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझे प्रणाम कर। इस प्रकार खुद को मुझमें नियुक्त करके तू मुझे ही प्राप्त होगा।
विश्लेषण (अध्याय का सार): यह गीता का मुख्य संदेश है। मन को भगवान में लगा देना ही योग की पूर्णता है।

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